योगमाया द्वारा अपने शत्रु के जन्म की बात सुनकर कंस ने ब्रज के सभी नवजात शिशुओं को मारने का आदेश दे दिया था। इसी क्रम में पूतना आदि उसके अनुचरों ने श्रीकृष्ण को मारने का प्रयास किया। लेकिन वे सभी स्वयं मारे गए। नारद जी जल्दी से कंस और उसके अत्याचारी सहायकों का अंत करना चाहते थे। इसलिए वे कंस से मिलने पहुँचे।
नारद जी कंस को कृष्ण, बलराम और योगमाया के जन्म और असली माता-पिता के विषय में बता दिया। उन्होने कंस को बताया कि उसके हाथ से छूट कर आकाश में जाने वाली कन्या वास्तव में यशोदा की पुत्री थी, जबकि यशोदा के यहाँ पलने वाले बलराम रोहिणी और कृष्ण देवकी की संतान हैं।
नारद जी ने उसे यह भी बताया कि वसुदेवजी ने अपने पुत्रों को बचाने के लिए अपने मित्र नंदजी के यहाँ ब्रज में रखा हुआ है। उनके पुत्रों ने ही कंस के सभी अनुचरों का वध किया है।
यह सुनते ही कंस अत्यंत क्रोधित हो गया। उसने वसुदेवजी को मारने के लिए तलवार उठा लिया। लेकिन नारद जी ने उसे रोक लिया। उसने वसुदेव और देवकी को फिर से हथकड़ी और बेड़ियों से जकड़ कर कारागार में डाल दिया।
कंस द्वारा श्रीकृष्ण को मारने की तैयारी
नारद जी के जाने के बाद कंस ने अपने अनुचर केशी को बुलाया और उसे ब्रज में जाकर कृष्ण और बलराम को मार डालने के लिए कहा। इसके बाद उसने मुष्टिक, चाणुर, शल, तोशल, आदि पहलवानों, मंत्रियों और महावतों को बुला कर कहा–
“वसुदेव के पुत्र बलराम और कृष्ण नन्द के ब्रज में रहते हैं, उनके हाथों ही मेरी मृत्यु बतलाई जाती है। इसलिए जब वह आए तुमलोग उन्हे कुश्ती लड़ने के बहाने मार डालना।“
कंस ने दंगल के लिए मंच और घेरे बनाने के लिए भी निर्देश दिया। घेरे के दरवाजे के पास कुवलयपीड़ नामक हाथी को रखा गया ताकि वह द्वार पर ही दोनों भइयों को मार डाले।
कंस ने कृष्ण-बलराम दोनों भाइयों को मथुरा बुलाने के लिए समारोहपूर्वक धनुष यज्ञ करने और उसी में कुश्ती करवाने की योजना बनाया। इसके लिए उसने आनेवाले चतुर्दशी को विधिपूर्वक धनुष यज्ञ को आरंभ करने के लिए भी निर्देश दिया।
कंस द्वारा कृष्ण-बलराम को लाने के लिए अक्रूर जी को भेजना
इस तरह दोनों भाइयों को मारने के लिए सारी तैयारी करने के बाद कंस ने यदुवंश के सम्मानित अक्रूर जी को बुलाया। उसने अक्रूर से अत्यंत प्रेम और मित्रतापूर्वक बातें की और बड़े अनुनय विनय करके उन्हें ब्रज में नंदजी के उनके यहाँ रहने वाले वसुदेवजी के दोनों पुत्रों को लाने के लिए भेजा। उसने उन्हें अपने ही रथ में चढ़ा कर लाने के लिए कहा।
साथ ही नन्द आदि गोपों को भी बड़े-बड़े उपहार देकर लाने के लिए कहा। कंस ने यह भी कहा कि अभी तो दोनों भाई बच्चे है, अभी उन्हें आसानी से मारा जा सकता है। उन्हें मारने के बाद उनके शोकाकुल अन्य बंधु-बांधवों को मारना और सरल हो जाएगा। इसके बाद अपने पिता उग्रसेन को मार कर अपने ससुर जरासंध और अन्य मित्रों की सहयता से अकंटक राज करेगा।
लेकिन अक्रूर जी को यह निर्देश दिया कि वे ये गुप्त बातें किसी को नहीं बताएँ। उन्हे ब्रज में जाकर नन्द जी और गोपों को धनुष यज्ञ के दर्शन और यदुवंशियों की राजधानी मथुरा की शोभा देखने के बहाने बुलाना था।
अक्रूर जी ने कंस की आज्ञा मान लिया लेकिन उसे यह कह कर कि वह अपनी मृत्यु को टालने के लिए यह सब प्रयत्न कर रहा है लेकिन मनुष्य को प्रयत्न का फल दैवी प्रेरणा से मिलता है।
