रावण अपने कुल, ज्ञान, भक्ति और तपस्या के कारण सबके आदर का पात्र था। लेकिन जैसे-जैसे उसकी शक्ति बढ़ती गई, अभिमान बढ़ता गया और चरित्र गिरता गया। इस बात को उसकी मृत्यु पर स्वयं उसकी पत्नी मंदोदरी एक श्लोक में बताती है, पहले आपने इंद्रियों को अपना दास बनाया था, लेकिन लगता है इसका बदला लेने के लिए बाद में इंद्रियों ने आपको अपना दास बना लिया, और इस कारण से आज आपकी यह स्थिति हो गई।
उसके चारित्रिक पतन को वाल्मीकि रामायण के इन वृतांतों से जाना जा सकता है:
भाई के रूप में
पुष्पक विमान के लिए उसने अपने सौतेले भाई कुबेर पर आक्रमण कर उसे हरा दिया।
अपनी बहन शूर्पनखा के पति को युद्ध में हरा कर मार डाला। उसने उसके पति यानि अपने जीजा, को जो कि हारने के बाद समर्पण कर चुका था, इस गुस्से में मार डाला कि उसकी सहानुभूति रावण के शत्रुओं यानि कि देवताओं के साथ थी। जीजा को मारने के बाद अपनी बहन को या किसी और को उसके संरक्षण में राजा बनाने के बदले उसने उसका राज्य मिला लिया। विधवा शूर्पनखा को विवश होकर मायके आना पड़ा। रावण ने बहन के सामने लज्जित अनुभव किया और उसे अपने सौतेले भाई खर दूषण के पास पंचवटी भेज दिया।
एक व्यक्ति के रूप में
रावण ने एक दो नहीं बल्कि सैकड़ों स्त्रियों का अपहरण किया था। वाल्मीकि रामायण के अनुसार देवताओं को युद्ध में हराने के बाद लौटते हुए उसने रास्ते में अनेक ऐसी स्त्रियों को अपहरण कर लिया जिसके पिता या पति ने पहले ही आत्मसमर्पण कर दिया था और जिसके छोटे-छोटे बच्चे थे। उन स्त्रियों को लेकर जब वह लंका आया तब विभीषण ने उसके इस कार्य का विरोध किया था। सीता उसके द्वारा अपहरण की गई अंतिम स्त्री थीं। ऐसा कृत्य धर्म के विरुद्ध था। यह ज्ञान होने के बावजूद उसने ऐसा किया।
उसने अनेक स्त्रियों के साथ दुष्कर्म किया था, जिसमें अंतिम थी अप्सरा पुंजिकस्थला जो कि उसके भाई कुबेर की बहू होने के नाते उसकी भी बहू के समान थी। इसके बाद ही उसे ब्रह्मा जी से श्राप मिला था कि अगर उसने किसी स्त्री के साथ फिर ऐसा किया तो उसके मस्तक के टुकड़े हो जाएंगे और वह मर जाएगा। इसीलिए उसने सीता जी के साथ ऐसा नहीं किया। सीता जी को विवाह का प्रस्ताव देते समय धमकी दी कि अगर वह एक साल के अंदर उसकी बात नहीं मानेंगी तो साल पूरा होने के बाद के अगली सुबह कलेवा में उनका मांस परोस दिया जाएगा।
रावण के इस चरित्र को उसकी बहन शूर्पनखा जानती थी इसलिए उसने यह सच नहीं कहा कि लक्ष्मण ने उसकी नाक क्यों काटा बल्कि यह कहा कि वह सीता जी को रावण के लिए लाने गयी थी। जबकि सच्चाई यह थी कि वह राम और लक्ष्मण को विवाह के लिए प्रस्ताव दे रही थी। जब दोनों भाई नहीं माने तो उसने सीता जी की हत्या करनी चाहिए जिसके लिए दंड स्वरूप लक्ष्मण जी ने उसकी कान और नाक काटा था। लेकिन शूर्पनखा जानती थी कि उसके भाई को उसकी कोई परवाह नहीं थी।
एक राजा के रूप में
सीता जी का अपहरण उसकी अपनी व्यक्तिगत कार्य था। इसमें साथ देने के लिए उसने मारीच को मारने की धमकी देकर जबर्दस्ती शामिल किया था। भाई कुंभकर्ण और विभीषण, नाना माल्यवन्त आदि सबने उसे देश के विनाश की चेतावनी दी लेकिन उसने सबको अनसुना कर सारे राज्य का विनाश करवा दिया। यहाँ तक कि उसके बेटे भी उसकी जिद्द के भेंट चढ़ गए। अपनी राजसभा में उसने सीता जी के प्रति अपनी आसक्ति और श्राप के कारण उन्हें नहीं पा सकने की विवशता भी स्वीकार किया था। एक राजा जो अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए देश को बलिदान कर दें, उसके राजनीति के ज्ञान का क्या उपयोग है।

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