बाली-सुग्रीव में शत्रुता के कारण
वानरों के राजा ऋक्षरजा की राजधानी किष्किन्धा थी। उनके दो पुत्र थे वाली और सुग्रीव। कई जगह एक कहानी मिलती है कि किसी कारण वश ऋक्षराज स्त्री के रूप में परिवर्तित हो गए थे। इसलिए उन्हें कई जगह बाली और सुग्रीव की माता भी कहा गया है। उनका पिता सूर्य भगवान को माना गया है। वाली का नाम प्रायः “बाली” मिलता है लेकिन रामायण में “वाली” कहा गया है। वाली बहुत बलशाली और पराक्रमी था। पिता उसे बहुत मानते थे। दोनों भाइयों में भी बहुत प्रेम था। पिता की मृत्यु होने पर मंत्रियों ने बड़े होने के कारण वाली को राजा बनाया। छोटा भाई सुग्रीव युवराज बना।
एक बार की बात है, मायावी दानव से वाली की शत्रुता हो गई। मायावी मय दानव का पुत्र और दुंदुभी का बड़ा भाई था। दुंदुभी को भी वाली मार चुका था। मायावी दानव बहुत ही बलवान था। एक बार आधी रात को नगर के दरवाजे पर आकर मायावी दानव वाली को युद्ध के लिए ललकारने लगा। वाली पत्नियों और भाई सुग्रीव के मना करने के बावजूद उससे लड़ने चला गया। उसके साथ उसका भाई सुग्रीव भी गया।
मय दानव और वाली का युद्ध
दोनों भाइयों को साथ आया देख कर मायावी दानव भाग कर एक सुरंग में चला गया। दोनों भाई भी उसके पीछे-पीछे उस सुरंग के द्वार तक पहुँच गए। वाली ने अपनी शपथ देकर सुग्रीव को साथ जाने से रोक दिया। सुग्रीव को वहीं द्वार के पास रखवाली के लिए छोड़ कर वाली स्वयं मायावी से लड़ने के लिए उस सुरंग में प्रवेश कर गया।
वाली एक साल से अधिक समय तक उस सुरंग (गुफा) से बाहर नहीं आया। सुग्रीव को अब भाई की चिंता होने लगी। एक दिन उस सुरंग से खून की धारा निकली। साथ ही असुर के गरजने की आवाज भी आई।
भ्रमवश वाली को मरा हुआ समझ कर सुग्रीव द्वारा उसे गुफा में बंद कर देना
सुग्रीव ने समझा कि उसका भाई वाली मारा गया है। जबकि वास्तव में मायावी मरा था। सुग्रीव ने एक बड़ा-सा पत्थर गुफा के द्वार पर रख दिया ताकि मायावी दानव गुफा से बाहर आकर उसे भी न मार दे। भाई को जलांजलि देकर सुग्रीव राजधानी किष्किन्धा पुरी लौट आया।
मंत्रियों द्वारा सुग्रीव को राजा बनाना
मंत्रियों ने वाली को मरा हुआ मान कर सुग्रीव को राजा बना दिया। इतने में वाली लौट आया। सुग्रीव को राजा बने देख कर उसने सोचा कि सुग्रीव जान बूझकर उसे मारने के लिए गुफा के द्वार पर पत्थर रख कर आ गया ताकि वह राजा बन सके। बड़े भाई के प्रति प्रेम होने के कारण सुग्रीव ने उसे कैद नहीं किया। वह उसे जीवित देख का खुश था। वह वाली का राज सिंहासन भी छोड़ने के लिए तैयार था। सुग्रीव ने वस्तुस्थिति बताया। लेकिन वाली संतुष्ट नहीं हुआ। उसने उसे शत्रु मान लिया।
वाली द्वारा सुग्रीव को अपना शत्रु मानना
वाली ने सुग्रीव के सभी मंत्रियों को कैद कर लिया। सुग्रीव को बहुत मारा। उसकी सारी संपत्ति और पत्नी जिसका नाम रुमा था, भी ले लिया।
अपनी जान बचाने के लिए सुग्रीव यहाँ-वहाँ भागता फिरा लेकिन वाली या उसके भेजे लोग उसे मारने के लिए तत्पर थे। रिष्यमुक पर्वत पर शाप के कारण वाली नहीं आ पाता था। इसलिए सुग्रीव ने अपने चार विश्वस्त मंत्रियों के साथ यहाँ शरण लिया।
राम का वाली वध की प्रतिज्ञा
सुग्रीव के द्वारा वाली से उसकी शत्रुता के इस कारण को सुन कर राम ने वाली के वध का संकल्प लिया। इस पर सुग्रीव ने उन्हे वाली के बल और पराक्रम के बारे में बताया। इसी क्रम में उसने वाली के शाप की बात भी बताया।
वाली को मतंग ऋषि का शाप
वाली इतना बलवान था कि बड़े-बड़े शीलाखण्डो और वृक्षों को गेंद की तरह उठा लेता था। एक बार उसने दुंदुभी नामक राक्षस, जो कि भैसे के रूप में था, को मार कर उसके शव को इतने ज़ोर से फेंका कि वह एक योजन दूर मतंग ऋषि के आश्रम के पास जाकर गिरा। उसके खून की कुछ बुँदे मुनि के शरीर और आश्रम में भी गिर पड़ी।
इससे क्रुद्ध होकर ऋषि ने शाप दिया कि “जिसने खून के छींटे डाल कर मेरे निवास स्थान इस वन को अपवित्र किया है, वह आज से इस वन में प्रवेश न करे। अगर वह इस वन में, या मेरे आश्रम के आसपास एक योजन तक प्रवेश करेगा तो उसकी तत्काल मृत्यु हो जाएगी।” उन्होने वाली के सहायकों को भी उस वन से निकाल दिया। चूंकि शाप के कारण मृत्यु के भय से वाली इस वन में नहीं आता था, इसलिए सुग्रीव अपने सहायकों के साथ यहीं रहते थे।
राम ने सारा वृतांत जानने के बाद बाली के वध की प्रतिज्ञा किया। राम द्वारा दुंदुभी राक्षस के कंकाल को पैर के अंगूठे से फेंकने और सात ताड़ के पेड़ को एक ही बाण से वेध देने से सुग्रीव को उनकी क्षमता पर भरोसा हो गया। अतः राम द्वारा उत्साह वर्द्धन करने पर सुग्रीव बाली को ललकारने के लिए सब के साथ किष्किन्धापुरी गए।
सुग्रीव-वाली युद्ध
नगर के द्वार पर जाकर सुग्रीव ने बाली को युद्ध के लिए ललकारा। ललकार सुनकर बाली अत्यंत क्रोध से बाहर निकला। दोनों भाइयों में भयंकर द्वन्द्व युद्ध होने लगा। राम वृक्ष की ओट से देख रहे थे। लेकिन वाली और सुग्रीव दोनों भाई दिखने में इतने समान थे कि कौन वाली है और कौन सुग्रीव– यह पहचानना कठिन था। अतः राम ने बाण नहीं चलाया। राम से सहायता नहीं मिलते देख कर घायल सुग्रीव रिष्यमुक पर्वत की तरफ भागने लगे। वाली ने उनका पीछा किया। पर सुग्रीव के मतंग वन में प्रवेश कर जाने के कारण वह लौट आया।
सुग्रीव का दुबारा वाली से युद्ध के लिए जाना
राम ने सुग्रीव को बताया कि दोनों भाइयों के एक जैसे दिखने के कारण वे बाण नहीं चला सके। सुग्रीव को फिर से उन्होने युद्ध के लिए भेजा। इस बार उनके गले में पहचान के लिए गजपुष्पी लता की माला पहना दिया। सभी एक बार फिर किष्किन्धापुरी पहुँचे।
राम का आश्वासन पाकर सुग्रीव ने फिर से वाली को युद्ध के लिए ललकारा। राम वृक्ष की ओट में छुप कर खड़े हो गए। ललकार सुन कर वाली बाहर आया।
तारा द्वारा वाली को समझाना
बाली की पत्नी तारा ने उसे रोकने का प्रयास किया और राम से मित्रता कर लेने की सलाह दिया। तारा का तर्क था कि एक बार हारने के बाद सुग्रीव बिना किसी सहायक के नहीं आया होगा। गुप्तचरों के अनुसार उसने राम से मित्रता कर ली थी। इस बार वह अधिक शक्तिशाली हो कर आया था। इसलिए तारा ने सुग्रीव को फिर से युवराज का पद देकर इस शत्रुता को समाप्त करने के लिए कहा। लेकिन अपने बल के अभिमान में वाली ने इस सलाह को अनसुना कर दिया।
वाली का वध
वाली और सुग्रीव में फिर भयंकर द्वन्द्व युद्ध हुआ। इस में सुग्रीव पस्त होने लगे। वे सहायता के लिए इधर-उधर देखने लगे। राम समझ गए कि अब उनके वचन को पूरा करने का समय आ गया है। उन्होने वाली पर बाण चला दिया। बाण लगते ही वाली खून से लथपथ होकर जमीन पर गिर पड़ा। अब राम और लक्ष्मण भी उसके समीप चले गए।
वाली ने, जब वह किसी और से युद्ध कर रहा था तब, बिना किसी अपराध के छुप कर उस पर बाण चलाने के लिए राम को कठोर वचन कहे। राम ने इसका जवाब देते हुए कहा कि छोटे भाई की पत्नी पुत्री के समान होती है, लेकिन वाली ने उस पर कुदृष्टि रखी। छोटे भाई के साथ जो क्रूरता किया। ये अपराध उसे मृत्यु दण्ड के योग्य बनाते है। राम ने उसे राजधर्म और अन्य कई तर्कों से उसकी बातों का जवाब दिया।
मरणासन्न वाली का राम के शरणागत होना
वाली अपने को धर्म भ्रष्ट मानते हुए राम के शरणागत हुआ। फिर रोते हुए उसने अपने पुत्र अंगद के लिए अपनी चिंता प्रकट किया। अपने एकलौते पुत्र अंगद के प्रति सद्भाव रखने और उसकी रक्षा का वचन उसने राम से लिया। उसे राम को सौंपते हुए उसके प्रति भरत और लक्ष्मण जैसा ही स्नेह रखने का आग्रह किया।
वाली ने यह भी बताया कि वह उनके हाथ से ही मरना चाहता था, इसलिए पत्नी तारा के मना करने पर भी सुग्रीव से युद्ध के लिए आ गया। उसने अपने कठोर वचनों के लिए क्षमा माँगा। राम ने अंगद के प्रति आश्वस्त करते हुए कहा कि दंड भोगने के बाद वाली भी निष्पाप हो गया था।
सुग्रीव को पश्चाताप और तारा आदि का विलाप
वाली के मरने से तारा, अंगद आदि का विलाप देख कर सुग्रीव को भी भाई कि हत्या कराने के लिए पश्चाताप हुआ। उसने ग्लानि से अपना प्राण दे देना चाहा। वाली की पत्नी तारा पति से साथ सती होना चाहती थी। पर, राम-लक्ष्मण दोनों भाइयों ने सब को समझा कर शांत किया।
सुग्रीव का राजा और अंगद का युवराज पद पर अभिषेक
सबने मिलकर वाली का अंतिम संस्कार किया। सुग्रीव को राजा और अंगद को युवराज बनाया गया। इस राज्याभिषेक समारोह में शामिल होने के लिए हनुमान के आमंत्रण को राम ने अपने वनवास के कारण अस्वीकार कर दिया।

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