राम ने कबंध को क्यों जीवित ही जला दिया?-भाग 34

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रामायण में मुख्य खलनायक वैसे तो रावण है जो बहुत ही बलशाली और कई विशेष गुणों से सम्पन्न था। लेकिन उसके अलावा भी कई बलशाली और विचित्र खलपात्रों या राक्षसों का इसमे उल्लेख है जिन्हें राम ने मारा।

रामायण का एक ऐसा ही एक विचित्र खल पात्र है कबंध। कबंध का शाब्दिक अर्थ होता है “जिसका केवल धड़ हो” अर्थात जिसका सिर नहीं हो। यह बिना सिर का एक विचित्र राक्षस था। इस राक्षस के संबंध में एक विशेष बात यह भी है कि इसका वध राम ने उसी दिन किया था, जिस दिन सीता का अपहरण हुआ था।

चूँकि जटायु ने दक्षिण दिशा में रावण द्वारा सीता को ले जाना बताया था। उस स्थान से दक्षिण-पश्चिम में वन अधिक गहन था। वहाँ रहने वाले वनवासी बाहरी लोगों से बहुत कम संबंध रखते थे। इसलिए यह संभव था कि रावण उधर ही सीता को ले गया हो, या वहाँ के निवासी इस बारे में कुछ और बता पाते। इसलिए राम-लक्ष्मण दोनों तेजी से उसी तरफ आगे बढ़ने लगे।

कबंध से राम-लक्ष्मण का सामना   

क्रौंचारण्य नामक गहन वन पार करने के बाद जब वे घने जंगलों से गुजर रहे थे। तभी उन्हें कबंध राक्षस मिला। उसके आने से पहले उसकी इतनी तेज आवाज आई कि लगा जैसे जंगल में तूफान आ गया हो। दोनों भाई किसी ख़तरे की आशंका से तुरंत हाथों में तलवार लेकर तैयार हो गए।

कबंध राक्षस

जब राक्षस उनके सामने आया तो उन्होंने देखा उसकी आकृति बड़ी विचित्र थी। उसका शरीर बहुत विशाल था लेकिन उसके सिर और गर्दन नहीं थे। इससे भी विचित्र यह था कि उसके पेट में मुँह बना हुआ था। इतना ही नहीं उसके भुजाएँ असामान्य रूप से बहुत बड़ी (दोनों भुजाएँ एक-एक योजन तक) थीं। उसका शरीर काले रंग का था, जिस पर तीखे रोएँ थे। दोनों भाई थोड़े दूर से ही उसे देखने लगे।

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तभी कबंध में अचानक दोनों भाइयों को अपने एक ही हाथ से पकड़ लिया। उसकी हाथों में इतनी शक्ति थी कि कुछ देर के लिए तो वे अपने को उसकी पकड़ से छुड़ाने में विवश अनुभव करने लगे। लक्ष्मण ने तो राम से उन्हें छोड़ कर अकेले निकल कर अपनी जान बचाने तक के लिए कह डाला। लेकिन राम ने उन्हें हिम्मत दिलाया।

बातचीत की शुरुआत कबंध ने ही किया। उसने दोनों भाइयों का परिचय पूछते हुए यह बताया कि वह बहुत भूखा था। संयोग से दोनों भाई उसके सामने उसकी भूख मिटाने के लिए आ गए। अब वे उन्हें मारकर खाएगा। तभी दोनों भाइयों ने अपने-अपने तलवारों से शक्तिशाली प्रहार उसकी दोनों बाँहों पर किया। तलवार के एक ही प्रहार से उसके दोनों बाँह कट गए। बाँह कटते ही कबंध धरती पर गिर पड़ा। दोनों भाई उसकी पकड़ से मुक्त हो गए।

अब लक्ष्मण ने अपने दोनों भाइयों का परिचय दिया। उन्होंने सीता हरण और अपने वहाँ आने का प्रयोजन भी बताया। अपना परिचय देने के बाद लक्ष्मण ने उससे उसका परिचय पूछा। घायल पड़े कबंध में अपने बारे में बताना शुरू किया।

कबंध को स्थूलशिरा ऋषि का शाप

कबंध एक समय बहुत ही सुंदर गंधर्व था। जितना वह सुंदर था उतना ही बलवान भी था। लेकिन अपने बल और सौंदर्य का उसे घमंड भी था। वह लोगों को तंग करने के लिए भयंकर राक्षस का रूप बना कर उन्हें डरा दिया करता था।

स्थूलशिरा नामक ऋषि एक दिन जंगल में कन्द-मूल इकट्ठा कर रहे थे। अचानक भयंकर राक्षस बन कर आए हुए कबंध ने उन्हें डरा दिया। उसके इस शरारत से ऋषि को क्रोध आ गया। उन्होंने उसे सदा उसी डरावने रूप में रह जाने का शाप दे दिया जिस रूप में वह लोगों को डरा दिया करता था।

अब कबंध को अपनी भूल का एहसास हुए। उसने ऋषि के क्षमा माँगा। ऋषि ने उसकी मुक्ति का मार्ग बताते हुए कहा कि जब राम के रूप में विष्णु का अवतार होगा, तब निर्जन वन में राम-लक्ष्मण उसका हाथ काट कर उसे जलाएंगे तभी उसे अपना मूल स्वरूप मिल पाएगा।  

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कबंध को ब्रह्मा का वरदान

इस तरह ऋषि के शापवश एक सुंदर गंधर्व डरावने आकृति वाला एक राक्षस बन गया। वह बलवान तो था ही। उसने अब ब्रह्मा की तपस्या करना शुरू किया। ब्रह्मा के प्रसन्न होने पर उसने उनसे अपने दीर्घजीवी होने का वरदान ले लिया।

इन्द्र पर आक्रमण

अब कबंध शक्ल से ही नहीं कर्म से भी भयंकर हो चुका था। ब्रह्मा के वरदान के कारण उसे मृत्यु का भय था नहीं। इसलिए उसने अपने शक्ति के घमंड में आकर देवराज इन्द्र पर आक्रमण कर दिया।

वह भले ही कितना भी शक्तिशाली था लेकिन इन्द्र के अस्त्र वज्र का उसके पास कोई जवाब अभी भी नहीं था। युद्ध में क्रुद्ध होकर इन्द्र ने उस पर वज्र से प्रहार किया। यह प्रहार इतना भीषण था कि उसका सिर और उसकी जांघें उसके अपने शरीर में ही घुस गया। अब इस अवस्था में वह मृत्यु चाहने लगा। लेकिन ब्रह्मा के वरदान के कारण उसकी मृत्यु नहीं हो सकी।

इंद्र का वरदान

इस तरह ब्रह्मा का वरदान उसके लिए अब शाप बन गया। इतना दुखमयी जीवन उसे तब तक जीना होता जब तक ऋषि के कथनानुसार राम का अवतार नहीं होता। उसने इन्द्र से कातर स्वर में प्रार्थना किया कि वज्र के प्रहार से उसका सिर, मुँह और जांघ कुछ नहीं बचा था। ऐसे हालत में न तो वह चल सकता था और न ही कुछ खा सकता था। इन्द्र ब्रह्मा के वरदान और ऋषि के शाप में तो परिवर्तन नहीं कर सकते थे लेकिन कबंध पर दया कर उन्होंने उसके पेट में ही तीखे दाढ़ वाला मुँह बना दिया। साथ ही उसकी दोनों बाँहें एक-एक योजन लंबी कर दी। ताकि वह बैठे-बैठे दूर से ही अपना शिकार पकड़ कर ला सके और उसे खा सके।

कबंध की मुक्ति

अपने इस विचित्र रूप के विषय में यह कहानी बताने के बाद कबंध ने राम-लक्ष्मण को बताया कि वह इतने दिनों से राम-लक्ष्मण के वन में आने की प्रतीक्षा करते हुए ही इस वन में रह रहा था। बाँह कटने से उसे विश्वास हो गया था कि ये दोनों भाई ही राम-लक्ष्मण हैं। इससे उसमें अपनी मुक्ति की आस जगी।

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कबंध ने दोनों भाइयों से उसका जीवित ही दाह-संस्कार करने के लिए कहा ताकि उसे इस यातना भरे शरीर से मुक्ति मिल जाए। उसने यह भी कहा कि इस तरह जीवित जलाने से उसे कोई पीड़ा नहीं होगी क्योंकि उसके मुक्ति के लिए ऐसा ही विधान है। अग्नि प्रज्वलित होते ही उसका यह शरीर छूट जाएगा और उसे दाह की पीड़ा से नहीं गुजरना पड़ेगा।

कबंध ने आगे कहा कि अभी उसकी बौद्धिक क्षमता इतनी अधिक नहीं थी कि सीता की खोज में वह राम की कोई सहायता कर सके लेकिन अपना वास्तविक स्वरूप पाने के बाद वह ऐसा जरूर करेगा।   

कबंध की प्रार्थना के अनुसार राम-लक्ष्मण ने एक गड्ढा खोद कर उसमें चिता बनाया और जीवित ही उसका दाह-संस्कार किया।

कबंध एक सुंदर नवयुवक के रूप में उस चिता की अग्नि से प्रकट हुआ। उसे ले जाने के लिए आकाश में हंसों से जुता सुंदर विमान प्रकट हुआ। दोनों भाइयों को प्रणाम कर वह उस रथ में जा बैठा।

कबंध द्वारा राम को सुग्रीव से मित्रता करने के लिए सलाह

पर सीता के खोज में बौद्धिक सहायता के अपने वचन का उसने पालन किया। उसने राम से सीता को पाने के लिए रिष्यमुक पर्वत पर रहने वाले वानर सुग्रीव से मित्रता करने के लिए कहा। सुग्रीव राक्षसों के सभी ठिकानों को जानते थे और इस समय कष्ट में थे। इतना कह कर कबन्ध ने रिष्यमुक पर्वत, पंपा सरोवर, जो इस पर्वत और सुग्रीव के लिए एक सीमा की तरह था, तक जाने का मार्ग बताया। उसने मतंग मुनि और शबरी के आश्रम के विषय में भी बताया। इतना बता कर कबन्ध चला गया।

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