कुम्भ में लगभग हर संप्रदाय के साधू संत और भक्त लोग आए हुए हैं। पर सबसे ज्यादा जो लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं वे हैं अघोड़ी, नागा और तरह-तरह के हठ योगी। इनमें से अधिकांश, लगभग सभी, भगवान शिव के ही भक्त हैं। लेकिन उनकी छवि परंपरागत साधू महात्माओं जैसी नहीं है। जब हम ऋषि-मुनि, साधू-संतो की बात करते हैं तो हमारे दिमाग में एक शांत मस्तिष्क के पवित्र जीवन जीने वाले व्यक्ति की छवि आती है जो धर्म के विषय में जानकारी रखता हो। लेकिन यहाँ धुआँ उड़ाते, हाथों में शस्त्र लिए साधू भी मिल जाते हैं। आम लोग सम्मान से ज्यादा उत्सुकता के कारण इन्हें देखना और उनके बारे में जानना चाहते हैं। तो कौन हैं ये? क्या करते हैं ये? दोनों इतने विपरीत स्वरूपों में से हिन्दू धर्म का वास्तविक स्वरूप कौन सा है? ये ज़्यादातर शिव के ही भक्त क्यों होते हैं? अजीब से भेषभूषा और नशा से क्या संबंध है इनका? साधू-संतों के तो आश्रम या मठ होते हैं, फिर इनके अखाड़ा क्यों हैं? इत्यादि अनेक प्रश्न उठते हैं।
इस संबंध में आगे बात करने से पहले हिन्दू धर्म के कुछ बेसिक कान्सैप्ट को समझना जरूरी है।
भगवान शिव का प्रेतों से संबंध
भगवान शिव निराकार ब्रह्म के साकार रूप हैं। उनका जन्म नहीं हुआ है इसलिए वे मृत्यु से भी परे हैं। इतना ही नहीं वे सभी इच्छाओं और कामनाओं से भी परे हैं, मुक्त हैं। इसीलिए वे कामदेव को मारने वाले हैं। भगवान विष्णु की तरह उन्हें न तो 56 भोग लगाया जाता है, न ही सुंदर-सुंदर गहने और कपड़ो से उन्हें सजाया जाता है। हालांकि भगवान विष्णु की भी अपनी कोई इच्छा नहीं है। पर वे अपने भक्तों की इच्छाओं को अपना लेते हैं। लेकिन शिव के साथ ऐसा नहीं है। वे पूर्णत: विरक्त होते हैं। उन्हें कुछ नहीं चाहिए।
इस तरह शिव के पास शरीर है लेकिन कामनाएँ नहीं, विरक्ति है। दूसरी तरह प्रेत होते हैं जिनके पास शरीर नहीं होता है लेकिन कामनाएँ होती हैं, आसक्ति होती है। आप लोगों में से अगर किसी ने कभी किसी का अंतिम संस्कार किया होगा तो पता होगा कि पिंडदान द्वारा प्रेत को पितर बनाने की क्रिया की जाती है और कोशिश की जाती है कि उसकी सांसारिक आसक्ति और इच्छाएँ खत्म हो सके।

इन दोनों अतिवाद के बीच संतुलन बनाने का कार्य करती हैं शक्ति यानि शिव की पत्नी पार्वती। कहानियाँ बताती हैं कि शक्ति यानि पार्वती की प्रेरणा से ही शिव कैलाश छोड़ कर काशी आए थे। यहाँ पार्वती अन्नपूर्णा के रूप में प्रतिष्ठित हुईं और शिव विश्वनाथ के रूप में। अगर आप काशी गए होंगे तो वहाँ अन्नपूर्णा से भिक्षा मांगते योगी रूप में शिव की मूर्ति या फोटो जरूर देखा होगा आपने।
यहाँ आकर शक्ति की प्रेरणा से विरक्त शिव अपने भक्तों के लिए थोड़े आसक्त हो जाते हैं। स्वयं जन्म-मृत्यु से परे शिव यहाँ मरने वालों को मोक्ष देते हैं और अपने गणों के लिए अन्नपूर्णा से भिक्षा मांगते हैं। लेकिन उनका यह सारा कार्य लोगों के कल्याण के लिए होता है, अपने लिए नहीं।
शिव का मृत्यु का संबंध
शिव के लिए जीवन और मृत्यु में कोई अंतर नहीं है। स्वयं तो वे मृत्युंजय हैं ही लेकिन दूसरे मर्त्य प्राणियों को भी मोक्ष देते हैं। वे विरक्त हैं, उनके लिए सभी एक बराबर हैं, इसलिए शमशान में रहने वाले चांडाल आदि लोगों के लिए भी उनका आश्रय हमेशा खुला हुआ है।
शिव का विष से संबंध
सृष्टि के कल्याण के लिए ही उन्होने समुद्र मंथन से उत्पन्न कालकूट विष पिया। कथा है कि इस विष को बर्दाश्त करने की क्षमता शिव को छोड़ कर और किसी में नहीं थी। शिव ने भी उसे बर्दाश्त तो कर लिया लेकिन इससे उन्हे थोड़ा कष्ट जरूर हुआ। कुछ जीव जंतुओं और पेड़-पौधों ने उनसे विष का कुछ भाग ले लिया ताकि उन्हें थोड़ा आराम मिल सके। शिव के विष में तो इससे कोई विशेष फर्क नहीं पड़ा लेकिन अपने प्रति उनकी यह भक्ति देख कर शिव प्रसन्न हुए और हमेशा उन्हें अपने पास रखने का वचन दिया। इसीलिए सांप, बिच्छू जैसे विषैले जीव, और भांग, आंक, धतूरा एवं बेल जैसे विषैले पौधे उनके प्रिय हो गए। लेकिन नशा से उनका कोई संबंध नहीं है। नशा पाँच महापापों में गिना जाता है।
शिव का पशुओं से संबंध
प्राचीन काल से ही शिव की पशुपति रूप की पूजा होती थी। हालांकि पशुओं के स्वामी वैदिक काल में विष्णु को माना गया था, गोपाल भी वही थे, लेकिन शिव पालतू पशुओं के नहीं, बल्कि वनीय पशुओं के देवता थे, उनके रक्षक थे।
इस तरह धीरे-धीरे हाशिये पर रहे लोग भूत-प्रेत, चांडाल, विरक्त योगी, विषैले और जंगली जीव-जन्तु इत्यादि उनसे एसोसिएटेड होते गए। शव, नशा, नग्नता इत्यादि कब और कैसे उनकी साधना से जुड़ते गए, इस पर हम अगले आलेख में बात करेंगे।

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