बलराम जी ने सूत जी की हत्या क्यों की थी?

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चाहे हम किसी व्रत या त्योहार की कथा सुने या फिर पुराण की, अधिकांश में एक वाक्यांश होता ही है “सूत उवाच:” यानि सूत जी ने कहा। साथ ही एक नाम और आता है “शौनक उवाच:”। कौन थे ये सूत जी? हर जगह इनका नाम क्यों आता है? और इससे भी महत्वपूर्ण यह कि इतने सम्मानीय व्यक्ति की हत्या भगवान श्रीकृष्ण के भाई बलराम जी ने क्यों कर दिया? वह भी एक भरी जनसभा के बीच में जब वह लोगों को कथा सुना रहे थे। ऐसी हत्या देख कर वहाँ उपस्थित लोगों ने क्या किया?       

सूत शब्द किसके लिए आया है?

वास्तव में सूत नाम नहीं बल्कि सरनेम है। कथाओं में सूत शब्द दो लोगों के लिए आता है, रोमहर्षण सूत और उनके पुत्र उग्रश्रवा सूत। ये दोनों भारत के सबसे प्रसिद्ध और सफल कथाकार हुए हैं।

सूत कौन थे?

शुरुआत में सूत एक पेशागत वर्ग यानि जाति थी। इनका कार्य होता था रथ बनाना, उसकी मरम्मत करना और चलाना। रथ युद्ध में तो काम आता ही था राजाओं और अन्य उच्च अधिकारियों के व्यक्तिगत आवागमन के लिए भी काम आता था। सारथी होने के कारण वह हमेशा उनके साथ रहता था। इसलिए सूत यानि रथकार का बहुत महत्व था। ऋग्वेद में राजा के 12 प्रमुख सलाहकारों में उसे स्थान दिया गया है। रामायण में राजा दशरथ के प्रधानमंत्री उनके सूत यानि सारथी सुमंत्र ही थे। हर प्रमुख अवसर पर वही रथ चलाते थे। गुरु वशिष्ठ के अलावा केवल उनको ही अनुमति थी कि वह राजदरबार या राजमहल के किसी भी भाग में कभी भी बिना अनुमति के जा सकते थे। महाभारत में भी भीष्म को अपने पिता के सत्यवती से प्रति प्रेम के विषय में उनके सारथी से ही पता चला था।

लेकिन धीरे-धीरे सूत जाति की सामाजिक स्थिति गिरती गई। इन्हें ब्राह्मण और क्षत्रिय से उत्पन्न वर्ण संकर कहा गया। महाभारत काल में इनकी स्थिति क्षत्रिय और वैश्यों के बीच की थी। दुर्योधन इन्हें क्षत्र मित्र यानि क्षत्रियों का मित्र कहता था।

मध्य काल तक इन्हें शूद्र की श्रेणी में रखा जाने लगा। लेकिन राज परिवार से नजदीकी अब भी रही। बहुत से सूत अब राजा के प्रशस्तिगान करने वाले कवि और चारण का काम भी करने लगे। इसलिए तुलसीदास इन्हें चारण, मागध, आदि दरबारी गायक जातियों की श्रेणी में रखते हैं।

रोमहर्षण सूत और उग्रश्रवा सूत

अब फिर आते हैं रोमहर्षण सूत पर। इनका नाम लोमहर्षण भी मिलता है। लेकिन दोनों शब्दों का अर्थ एक ही होता है ‘जिससे रोम हर्षित हो जाए’। ऐसा माना जाता है कि ये इनका वास्तविक नाम नहीं था। इनके कथा कहने की शैली ऐसी थी कि सुनने वाले रोमांचित हो जाते थे। इसलिए इनको यह नाम दिया गया था। इसी तरह इनके बेटे का असली नाम कुछ और था लेकिन ऊंचा बोलने के कारण उनको उग्रश्रवा नाम दिया गया।

रोमहर्षण सूत

रोमहर्षण की रुचि आरंभ से ही अपने पारिवारिक व्यवसाय रथकार में नहीं थी। उन्हें कथा और पुराण सुनना अच्छा लगता था। इसलिए जहां कहीं भी कोई कथा–पुराण का वाचन होता, उन पर चर्चा होती वह वह वहाँ पहुँच जाते थे। उनकी यादाश्त बहुत अच्छी थी। और कहानी कहने की शैली बहुत रोचक। वह एक कहानी कहते-कहते उसमें कोई ऐसी बात कह देते कि लोग उससे संबन्धित दूसरी कहानी सुनने के लिए उत्सुक हो जाते। इस तरह एक के बाद दूसरी, फिर तीसरी, चौथी कहानी को एक दूसरे में पिरोते चले जाते थे। हर प्रश्न का जवाब वह किसी न किसी पुरानी कहानी के माध्यम से देते थे। उनकी यह शैली लोगों को बहुत पसंद आती थी।

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रोमहर्षण सूत को ब्राह्मण का पद मिलना

धीरे-धीरे उनकी लोकप्रियता बढ़ती गई। उनसे कथा सुनने दूर दूर से लोग आने लगे। उनके प्रशंसकों में बहुत से ऊंची जाति जैसे कि ब्राह्मण वर्ण के लोग भी थे। उनके ज्ञान और आचरण के कारण ब्राह्मणों ने उन्हें ‘ब्राह्मण’ की पदवी दी। यह एक स्पष्ट उदाहरण है कि इस समय तक भी लोग अपनी योग्यता के आधार पर अपना वर्ण या जाति बदल सकते थे। जाति हमेशा जन्मगत नहीं होती थी।   

रोमहर्षण सूत और शौनक ऋषि   

रोमहर्षण के प्रशंसकों में एक भृगु वंशी ब्राह्मण शौनक भी थे। हालांकि यह उनका भी कुलनाम यानि सरनेम था नाम नहीं। शौनक जी ज्ञान विज्ञान के प्रति बहुत रुचि रखते थे। वह ज्ञान के आदान-प्रदान के लिए सत्र आयोजित करते थे। इन सत्रों में दूर दूर से ऋषि मुनि और ज्ञान में रुचि रखने वाले लोग आते थे। एक-दूसरे से मिलते और चर्चा करते थे। ऐसे सत्रों में नैमिषारण्य में 12 वर्षों तक होने वाला सत्र बहुत प्रसिद्ध है। इस सत्र में रोमहर्षण सूत एक वक्ता के रूप में बुलाए गए थे। उन्हें ब्राह्मण की पदवी देकर व्यास गद्दी का अधिकारी बनाया गया था।

यहीं विभिन्न चर्चा और प्रवचन के क्रम में लोगों के पूछने पर उन्होने महाभारत, भागवत पुराण तथा अन्य पुराणों की कथा को सुनाया था।

उग्रश्रवा सूत

नैमिषारण्य के इसी सत्र में बलराम जी ने रोमहर्षण सूत की हत्या कर दी। उनकी हत्या के बाद शौनक और अन्य लोगों के समक्ष एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह था कि उनकी मृत्यु के बाद सत्र को पूरा कैसे किया जाय। क्योंकि 12 वर्ष तक सत्र चलाने का संकल्प लिया जा चुका था। बहुत से लोग देश के विभिन्न भागों से केवल ज्ञान प्राप्त करने और अपनी जिज्ञासाओं का समाधान करने आए थे।

इसलिए सबने मिलकर यह निर्णय लिया कि रोमहर्षण सूत के बेटे उग्रश्रवा सूत को यह ज़िम्मेदारी सौंपी जाय। क्योंकि पिता ने उन्हें अपना सारा ज्ञान और विद्या पढ़ाया था। साथ ही उग्रश्रवा की अपनी यादाश्त और कथा कहने की रोचक शैली भी थी। पिता की तरह ही उनको भी ब्राह्मण की पदवी दे कर व्यास आसान पर बैठाया गया। शेष सत्र का संचालन उनके ही नेतृत्व में हुआ।

महाभारत और पुराणों का प्रचार-प्रसार

इस तरह 12 वर्षों तक दोनों पिता पुत्र के नेतृत्व में अनवरत ज्ञान चर्चा होती रही। पुराने ग्रन्थों को दोनों ने फिर से अपने शब्दों में सुनाया। सुनने-सुनाने का यह कार्यक्रम प्रश्नोत्तर के रूप में होता था। शौनक जी उनसे कोई प्रश्न करते और उसका उत्तर देने के क्रम में वह कथा सुनाते थे। कथा सुनाने के क्रम में वह यह भी बताते थे कि उन्हें यह जानकारी कहाँ से मिली यानि उन्होने यह कहाँ सुना। यह चर्चा का एक प्राचीन भारतीय तरीका था। चूंकि ज़्यादातर ज्ञान मौखिक में होता था। इसलिए उसका स्रोत बताने से श्रोताओं में विश्वास बढ़ता था।

यहीं इन कथाओं को देश के विभिन्न भागों से आए हुए लोगों ने सुना। उन्होने बाद जाकर अपने अपने क्षेत्र में इन कथाओं को अपने अंदाज में या थोड़ा सा स्थानीयकरण करते हुए सुनाया जिसे बाद में लिख लिया गया। इसलिए देश के अलग-अलग भागों में इन पुराणों के अलग-अलग वर्जन मिलते हैं।

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आज हमारे सामने महाभारत या पुराण का जो लिखित रूप है वह वास्तव में पुराने समय से मौखिक रूप से आती जा रही कहानियों को सूत पिता-पुत्र के शब्द में सूत-शौनक संवाद के रूप में कहा गया और उनके बहुत बाद में आज से लगभग 2600 साल से लेकर 500 साल पहले तक लिखा गया।

रोमहर्षण सूत की हत्या बलराम जी ने क्यों किया?

इन समस्त विवरण से यह तो निश्चित है कि सूत जी एक बहुत ही सम्मानीय व्यक्ति थे जिनकी किसी से कोई शत्रुता नहीं थी। फिर बलराम जी ने उनकी हत्या क्यों की?

भागवत पुराण में इस घटनाक्रम का जो विवरण दिया गया है उसके अनुसार जब यह लगने लगा कि महाभारत का युद्ध होकर रहेगा तब बलराम जी इसमें किसी का पक्ष नहीं लेना चाहते थे। क्योंकि पांडव उनके संबंधी थे और उनके साथ अन्याय हुआ था। दूसरी तरह दुर्योधन उनका शिष्य रहा था और उसके प्रति उनका विशेष स्नेह था। दूसरी तरह उनके छोटे भाई भगवान श्रीकृष्ण की सहानुभूति पांडवों के साथ थी। इसलिए वह इस युद्ध में अपने को निरपेक्ष रखते हुए तीर्थयात्रा पर निकल गए। विभिन्न तीर्थों का भ्रमण करते हुए जब वे नैमिषारण्य में आए तब उस समय वहाँ शौनक मुनि का 12 वर्षों वाला सत्र चल रहा था। सत्र देखने और ऋषि-मुनियों से मिलने की उत्सुकता में वह वहाँ पहुंचे। उनके पहुँचते ही वहाँ उपस्थित लोगों ने उठ कर उनका स्वागत-सत्कार और प्रणाम किया। लेकिन व्यास गद्दी पर बैठे सूत जी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

सूत जी के व्यवहार से बलराम जी बड़े आहत हुए। उन्हे वहाँ की पूरी व्यवस्था पता नहीं थी। उन्हें लगा कि यह निम्न वर्ण में उत्पन्न सूत सबसे ऊंचे आसन पर बैठा हुआ है। साथ ही जब सब उठ कर उन्हें नमस्कार करने लगे तब भी वह नहीं उठा। उन्होने सूत जी को अभिमानी, धृष्ट और जबर्दस्ती दूसरे के आसन पर बैठने वाला समझा। तीर्थ यात्रा में होने के कारण उनके पास उस समय कोई अस्त्र-शस्त्र नहीं था। इसलिए उन्होने एक तिनका उठाया और मंत्र से अभिषिक्त कर उससे सूत जी पर प्रहार कर दिया। शारीरिक रूप से कमजोर सूत जी की मृत्यु सबके सामने एक ही प्रहार में हो गई।

हत्या के विषय में विवाद

इस विवरण से तो यही लगता है कि बलराम जी वर्ण के प्रति बड़े कट्टर, जल्दीबाज़ और दूसरों के जीवन की अधिक परवाह करने वाले नहीं थे। लेकिन अन्य प्रसंगों से उनका व्यक्तित्व इसके उल्टा लगता है। ऐसे कुछ तर्क हैं:

1. महाभारत के अनुसार सूत जाति क्षत्रिय और वैश्य वर्ण के बीच की अवस्था में उस समय मानी जाती थी। सूत जी के अगर अपने वर्ण के विपरीत आचरण करने से वह इतने क्रोधित हुए हो यह इसलिए सही नहीं लगता क्योंकि बलराम जी स्वयं तृतीय यानि वैश्य वर्ण में आते थे। उन्होने यादवों का व्यवसाय छोड़ कर क्षत्रियों का कार्य अपनाया था।

2. वह महाभारत के युद्ध में हिस्सा नहीं लेना चाहते थे, रुकमी को मारने के विरुद्ध कृष्ण को सलाह दिया था, द्विविद वानर उनसे युद्ध करने के लिए पहले बहुत से उपद्रव किया लेकिन बहुत सहन करने के बाद अपने लोगों के बचाने के लिए उससे युद्ध करने के लिए तैयार हुए। इन सबसे ऐसा लगता है कि वह बहुत जल्दी क्रोधित हो जाने वाले हिंसक प्रवृति के नहीं थे। फिर जब वह तीर्थयात्रा में हों ऐसे समय में केवल नमस्कार नहीं करने या ऊंचे आसन पर बैठने के कारण किसी दुर्बल निरस्त्र व्यक्ति की हत्या कर दें, यह तर्क संगत नहीं लगता है।

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3. उनकी हत्या का जो भी विवरण अभी मिलता है वह उनके पुत्र उग्रश्रवा सूत के द्वारा ही सुनाया गया था सभा को बाद में। इसलिए ऐसी संभावना हो सकती है कि उनकी सहानुभूति अपने पिता के प्रति हो और उन्होने पूरी बात नहीं बताई हो।

कुछ लोग मानते हैं कि यह हो सकता है अपने प्रति सम्मान प्रकट नहीं किए जाने के कारण बलराम जी नाराज हों लेकिन इस कारण उन्होने हत्या नहीं की होगी। यह संभावना हो सकती है कि सूत जी जो कि कहानी को रोमांचक बनाने के लिए जाने जाते हैं, कहानी को रोमांचक बनाने के लिए बढ़ा चढ़ा कर बोल रहे हों और इससे उन्हें क्रोध हो आया हो।

ऐसा इसलिए भी लगता है कि जो भाष्य, टीका आदि उनसे पहले या उनके समकालीन लोगों द्वारा लिखे गए थे वे इतने नाटकीय नहीं हैं जितने सूत जी द्वारा सुनाए गए पौराणिक कथाएँ। उदाहरण के लिए वेद व्यास ने महाभारत की रचना की थी और अपने शिष्यों और पुत्र को सुनाया था। इन शिष्यों में से एक शिष्य वैशम्पायन ने जनमेजय के सर्प यज्ञ में उनकी अनुमति से और उनकी उपस्थिति में ही यह कथा सुनाया था जहां सूत जी ने यह कथा सुनी थी। वेद व्यास ने यह महाभारत महाकाव्य अपने शिष्यों सुमन्तु, जैमिनि, पैल, वैशम्पायन को सिखाया था और इन सबने बाद में इस पर भाष्य लिखा था।                   

बाद के कुछ ग्रन्थों में सूत जी को वेद व्यास का परम प्रिय शिष्य कहा गया है लेकिन भागवत और महाभारत में सिर्फ इतना कहा गया था कि वे यज्ञ में मिले थे जहां सूत जी ने यह कथा सुना था। वेद व्यास के शिष्यों का जहां उल्लेख है वहाँ भी रोमहर्षण सूत का कोई उल्लेख नहीं है।   

सूत जी की हत्या पर सत्र की प्रतिक्रिया

कारण चाहे जो रहा हो, पर चलते सत्र में व्यास आसन पर बैठे व्यक्ति की हत्या को सभा में उपस्थित लोगों ने अनुचित माना। उन लोगों ने बलराम जी को बताया कि उनलोगों ने ही उन्हें ब्राह्मण की पदवी देकर व्यास आसन पर बैठाया था। व्यास आसन पर बैठे व्यक्ति के लिए किसी को सम्मान देने के लिए उठना या नमस्कार करना आवश्यक नहीं होता है। इसलिए उनकी हत्या से बलराम जी को ब्रह्म हत्या का पाप लगा है जिसका उनको प्रायश्चित करना होता। उनलोगों ने यह भी कहा कि चूंकि बलराम जी के कारण सत्र में व्यवधान आया था इसलिए इस सत्र को निर्विघ्न पूरा करना उनकी ही ज़िम्मेदारी थी। बराम जी इन सभी बातों को मानते हुए, रोमहर्षण के पुत्र उग्रश्रवा को ब्राह्मण मान कर व्यास गद्दी पर बैठने और राक्षसों से सत्र की रक्षा करने के लिए तैयार हुए। बाद में उन्होने अनेक तीर्थयात्रा और यज्ञ कर करसत्र के ऋषि-मुनियों द्वारा बताए गए तरीके से पाप का प्रायश्चित किया।

रोमहर्षण और उग्रश्रवा सूत का योगदान

रोमहर्षण और उग्रश्रवा सूत पर पौराणिक कथाओं को बढ़ा-चढ़ा कर अधिक रोमांचक और कम विवेक सम्मत बनाने के आरोप भले ही लगे हों लेकिन यह भी सच है कि वर्तमान में हमारे अधिकांश पुराण सूत-शौनक संवाद के रूप में ही उपलब्ध हैं। साथ ही यह प्रसंग यह भी बताता है कि जिस युग में कर्ण अपने को सुतपुत्र होने पर अपमानित महसूस करता था ठीक उसी युग में उन दोनों में अपनी योग्यता के कारण ब्राह्मण का पद पाया और ब्राह्मणों को भी उपदेश दिया।      

1 thought on “बलराम जी ने सूत जी की हत्या क्यों की थी?”

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