दारिद्र्य दहन शिव स्तोत्र (हिन्दी अर्थ सहित)

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दारिद्र्य दहन शिव स्तोत्र, जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इस स्तोत्र के प्रतिदिन पाठ करने से भगवान शिव प्रसन्न होकर दरिद्रता का नाश कर धन्य-धान्य और अन्य प्रकार के सुखों को प्रदान करते हैं। अगर कोई व्यक्ति कर्ज में डूबा हो या व्यापार में हानि हो रही हो तो उसे अवश्य ही इस स्तोत्र का भक्तिपूर्वक पाठ करना चाहिए।

माना जाता है कि महर्षि वशिष्ठ ने इस स्तोत्र की रचना की है। यह एक अत्यंत प्राचीन स्तोत्र है।   

यह विश्वास किया जाता है कि यदि धनाभाव के कारण कष्ट में पड़ा व्यक्ति प्रतिदिन शिवमंदिर में या शिव की प्रतिमा के सामने तीन बार इस स्तोत्र का पाठ करें तो भगवान शिव उस पर अवश्य कृपा करते हैं और उसका कष्ट दूर करते हैं। सर्वोत्तम तो यह होता है कि जो व्यक्ति कष्ट में हो वह स्वयं इसका पाठ करे। पर अगर किसी कारणवश वह इस स्थिति में नहीं हैं तो उसके परिवार के अन्य सदस्य, जैसे पत्नी या माता-पिता भी उसके बदले पाठ कर सकते हैं। केवल पाठ के लिए संकल्प लेते समय उस व्यक्ति के कष्ट का ध्यान करें। सर्वज्ञ भगवान शिव आपकी प्रार्थन जरूर सुनते हैं। 

इसके आठ छंदों में शिव की स्तुति है। नवें छंद में इसके पाठ से होने वाले परिणाम यानि फलश्रुति का वर्णन है।

ये 9 श्लोक या छंद इस प्रकर हैं:

अर्थ– समस्त चराचर विश्व के स्वामी विश्वेश्वर, नरकरूपी संसार सागर से उद्धार करनेवाले, कान से श्रवण करने में अमृत के समान नामवाले, अपने भाल पर चन्द्रमा को आभूषण रूप में धारण करनेवाले, कर्पूर की कान्ति के समान धवल वर्ण वाले, जटाधारी और दरिद्रतारूपी दुःख के विनाशक भगवान शिव को मेरा नमस्कार है। 

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अर्थ– गौरी के अत्यन्त प्रिय, चन्द्रमा की कला को धारण करनेवाले, काल के लिए भी यमरूप, नागराज को कंकण रूप में धारण करनेवाले, अपने मस्तक पर गंगा को धारण करनेवाले, गजराज का विमर्दन करनेवाले और दरिद्रतारूपी दुःख के विनाशक भगवान शिव को मेरा नमस्कार है। 

अर्थ– भक्ति के प्रिय, संसाररूपी रोग एवं भय के विनाशक, संहार के समय उग्ररूपधारी, दुर्गम भवसागर से पार करानेवाले, ज्योति स्वरुप, अपने गुण और नाम के अनुसार सुन्दर नृत्य करनेवाले तथा दरिद्रतारूपी दुःख के विनाशक भगवान शिव को मेरा नमस्कार है। 

अर्थ– व्याघ्र चर्मधारी, चिता भस्म को लगानेवाले, भाल में तृतीय नेत्रधारी, मणियों के कुण्डल से सुशोभित, अपने चरणों में नूपुर धारण करनेवाले जटाधारी और दरिद्रतारूपी दुःख के विनाशक भगवान शिव को मेरा नमस्कार है। 

अर्थ– पाँच मुखवाले, नागराजरूपी आभूषणों से सुसज्जित, सुवर्ण के समान वस्त्रवाले, तीनों लोकों में पूजित, आनन्दभूमि (काशी) को वर प्रदान करनेवाले, सृष्टि के संहार के लिए तमोगुण धारण करनेवाले तथा दरिद्रतारूपी दुःख के विनाशक भगवान शिव को मेरा नमस्कार है। 

अर्थ– सूर्य को अत्यन्त प्रिय, भवसागर से उद्धार करनेवाले, काल के लिये भी महाकालस्वरूप, ब्रह्मा से पूजित, तीन नेत्रों को धारण करनेवाले, शुभ लक्षणों से युक्त तथा दरिद्रतारूपी दुःख के विनाशक भगवान शिव को मेरा नमस्कार है।

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अर्थ– मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम को अत्यन्त प्रिय, रघुनाथ को वर देनेवाले, सर्पों के अतिप्रिय, भवसागररूपी नरक से तारनेवाले, पुण्यवानों में परिपूर्ण पुण्यवाले, समस्त देवताओं से सुपूजित तथा दरिद्रतारूपी दुःख के विनाशक भगवान शिव को मेरा नमस्कार है। 

अर्थ– मुक्तजनों के स्वामिरूप, चारों पुरुषार्थ के फल देनेवाले, प्रमथादि गणों के स्वामी, स्तुतिप्रिय, नन्दीवाहन, गजचर्म को वस्त्ररूप में धारण करनेवाले, महेश्वर तथा दरिद्रतारूपी दुःख के विनाशक भगवान शिव को मेरा नमस्कार है। 

अर्थ– समस्त रोगों के विनाशक तथा शीघ्र ही समस्त सम्पत्तियों को प्रदान करनेवाले और पुत्र– पौत्रादि वंश परम्परा को बढ़ानेवाले, वसिष्ठ द्वारा निर्मित इस स्तोत्र का जो भक्त नित्य तीनों कालों में पाठ करता है, उसे निश्चय ही स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है। 

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