यह सच है कि सीता का पता हनुमानजी ने लंका जाकर लगाया था। लेकिन हनुमान से राम सीता का पता करने के क्रम में ही मिले थे। वास्तव में सीता के अपहरण से लेकर लंका में हनुमान के उनसे मिलने तक उनकी खोज को तीन चरणों में रखा जा सकता है।
राम-लक्ष्मण द्वारा अकेले सीता को ढूँढना
मृगों और जटायु द्वारा सीता हरण की सूचना
सबसे पहले आश्रम के आसपास रहने वाले मृगों से यह संकेत मिला कि सीता को आकाशमार्ग से दक्षिण दिशा की तरफ ले जाया गया था। उसी दिशा में आगे चलने पर जटायु मिले जिन्होने बताया कि सीता को रावण ले गया था। लेकिन रावण कौन था, कहाँ रहता था, सीता को लेकर कहाँ गया, ये कुछ भी पता नहीं था। अतः जटायु का अंतिम संस्कार करने के बाद वे लोग क्रोञ्चारण्य नामक गहन वन की तरफ बढ़े। यहीं उन्हे कबंध राक्षस मिला।
कबंध द्वारा सुग्रीव से मित्रता के लिए सलाह
कबंध वास्तव में शापग्रस्त गंधर्व था। राम ने उसे शाप मुक्त कर दिया। कबंध ने वानरों के राज्य किष्किंधा के निर्वासित पूर्व राजा सुग्रीव से मित्रता करने का सुझाव दिया जो कि उस समय रिष्यमुक पर्वत पर रह रहे थे। इसका कारण यह था कि सुग्रीव को दंडकारण्य ही नहीं बल्कि उससे दक्षिण के समस्त क्षेत्र के भौगोलिक स्थिति का बहुत अच्छा ज्ञान था। इसलिए कबंध का अनुमान था कि सुग्रीव सीता की खोज में राम की सहायता कर सकते थे।
इस समय तक शाम होने लगी थी। पर दोनों भाई वापस पंचवटी स्थित अपने पर्णकुटी नहीं गए। रास्ते में उचित स्थान पर रात्री विश्राम करते हुए वे कबंध के बताए रास्ते से पंपा सरोवर, मातंग वन होते हुए रिष्यमुक पर्वत पहुंचे। रास्ते में मातंग वन में शबरी के आश्रम जाकर उससे मिले।
सुग्रीव और हनुमान से मिलना
सुग्रीव से उन्हे सीता द्वारा सुग्रीव आदि वानरों को लक्ष्य कर फेंके गए आभूषण मिले। उस स्त्री द्वारा राम-लक्ष्मण का नाम पुकारने और आभूषण से यह तो निश्चित हो गया कि वह सीता ही थी। पर केवल इतना पता चल सका कि कोई राक्षस सीता को लेकर आकाशमार्ग से पंपा सरोवर को पार करते हुए दक्षिण की तरफ ले गया था। लेकिन दक्षिण दिशा की तरफ कहाँ और कितनी दूर ले गया, ये पता नहीं चल पाया।
सुग्रीव ने अपने वानरों को भेज कर सीता की खोज कराने का आश्वासन दिया। इस बीच राम ने बाली का वध कर सुग्रीव को किष्किंधा का राजा बना दिया। अब तक वर्षा ऋतु आ गई थी। बरसात में जंगलों और पहाड़ों से भरे दक्षिण के प्रदेश में सीता की खोज व्यावहारिक दृष्टि से कठिन था। अतः यह विचार हुआ कि बरसात के चार महीने तक राम-लक्ष्मण प्रस्रवण गिरि नामक पर्वत, जो कि रिष्यमुक पर्वत के पास ही था, पर स्थित एक गुफा में रहते। बरसात के बाद सुग्रीव वानरों को सीता की खोज में भेजते।
बरसात के चार महीने राम-लक्ष्मण ने सीता की कुशलता की कामना करते हुए किसी तरह बिताया। राज्याभिषेक के बाद सुग्रीव सभी मंत्रियों के साथ किष्किन्धा आ गए थे। बरसात के चार महीने वे सब किष्किंधा में रहे। इसके बाद वानरों को भेज कर सीता की खोज करने का कार्य शुरू हुआ।
वानर सेना का समुद्र तट तक सीता को खोजना
बरसात बीतने के बाद सुग्रीव ने अपने वचन के अनुसार वानर यूथों को सीता की खोज के लिए भेजा। यह प्रसंग इस प्रकार है:
वर्षा ऋतु बीतने पर भी सुग्रीव की तरफ से कोई संदेश नहीं आया तो राम को रोष हो आया। उन्होने लक्ष्मण को किष्किन्धा भेजा। क्रोध में लक्ष्मण को आया देख किष्किन्धापुरी में सभी डर गए। लेकिन तारा और हनुमान जी के समझाने और सुग्रीव के क्षमा माँगने पर वे शांत हुए।
वानर सैनिकों का सीता की खोज में जाना
लक्ष्मण के साथ सुग्रीव भी राम के पास आए और वानर सैनिको को बुलाए जाने के आदेश के विषय में उन्हे सुनाया। बाद में सभी वानर सेनापति अपनी-अपनी सेना के साथ राम के पास आए।
सुग्रीव ने राम की आज्ञा से वानरों का समूह बना कर भिन्न-भिन्न दिशाओं में भेजा। सुग्रीव को स्थानों और भौगोलिक स्थिति का बहुत अच्छा ज्ञान था। यह ज्ञान उन्हे तब मिला था जब वे वाली के भय से भागे फिर रहे थे। वे सभी वानर समूहों को, जिस दिशा में उन्हे जाना होता था उसका, पूरा विवरण देकर भेजते थे।
सीता की खोज में दक्षिण जाने वाला वानर समूह
चूँकि सीता के मिलने की सबसे अधिक संभावना दक्षिण दिशा में थी। इसलिए दक्षिण दिशा में जाने वाले समूह में प्रमुख वानर सेनापति रखे गए थे। इनमे हनुमान और युवराज अंगद के अतिरिक्त जांबवान, नील, गंधमादन आदि भी थे। सुग्रीव ने इन सबको दक्षिण दिशा के स्थानों के विषय में विस्तार से बताया।
राम द्वारा हनुमान को सीता को प्रमाण देने के लिए अंगूठी देना
सुग्रीव को हनुमान से विशेष आशा थी कि वही इतने सक्षम थे कि सीता का पता लगा सकते थे। राम भी उनसे सहमत थे। इसलिए उन्होने अपने नाम के अक्षरों से युक्त एक अंगूठी हनुमान को दी। जब वे सीता से मिलते तो उन्हे विश्वास दिलाने के लिए पहचान चिह्न के रूप में ये अंगूठी उन्हे देना था। सुग्रीव, लक्ष्मण और राम को प्रणाम कर यह समूह दक्षिण दिशा में सीता की खोज के लिए चला।
दक्षिण दिशा में वानरों द्वारा सीता की खोज
यह समूह दक्षिण दिशा में सुग्रीव के बताए रास्ते पर बहुत दूर तक चला। विंध्य पर्वत के आसपास का क्षेत्र बहुत दुर्गम और गुफाओं और जंगलों से भरा था। कठिनाइयों के बावजूद वानरों ने हर जगह ढूँढा। लेकिन सीता का कहीं पता नहीं चल सका। वे सब निराश हो गए। सुग्रीव द्वारा लौटने के लिए निश्चित तिथि बीत चुकी थी। इस अवधि के बाद सीता का पता लगाए बिना आने पर मृत्यु दण्ड मिलता।
वानरों का रहस्यमयी गुफा में प्रवेश और तपस्विनी स्वयंप्रभा द्वारा सहायता
अपने सेनापतियों अंगद और गंधमादन के उत्साहवर्धन से यह दल फिर आगे बढ़ा। भूखे प्यासे वानरों को एक गुफा से निकलते पक्षियों से गुफा के अंदर पानी मिलने की उम्मीद हुई। गुफा बाहर से तो अंधेरा दिखाई दे रहा था। लेकिन अंदर जाकर उन्होने एक दिव्य सरोवर, वृक्ष और भवन देखा। वहाँ एक तेजस्विनी वृद्धा तपस्विनी बैठी थी।
हनुमान के पूछने पर उस तपस्विनी ने अपना नाम स्वयंप्रभा बताया। उसने इस रहस्यमयी गुफा के विषय में भी बताया। मयासुर ने वह अद्भुत भवन और वह वन आदि बनाया था। उसका हेमा नमक एक अप्सरा से प्रेम हो गया। वह हेमा के साथ इस महल में रहने लगा। इस कारण इन्द्र ने उसे वहाँ से मार भगाया। बाद में ब्रह्मा ने यह भवन हेमा को दे दिया। हेमा ने अपनी सखी स्वयंप्रभा को इसकी रक्षा करने के लिए नियुक्त किया था।
तपस्विनी स्वयंप्रभा ने सभी को भोजन और पानी दिया। उस के पूछने पर वानरों ने अपना वृतांत कह सुनाया जिस कारण वे भटकते हुए पहुँच गए थे। उन्होने उस गुफा से बाहर जाने का रास्ता भी पूछा। तपस्विनी ने कहा कि यद्यपि वहाँ एक बार आकर जीवित वापस जाना संभव नहीं था, लेकिन उन सब को वह बाहर निकाल देगी। उसके निर्देशानुसार सभी ने अपनी आँखे बंद कर ली। आँखे बंद करते ही सब गुफा के बाहर आ गए।
तपस्विनी ने कहा “यह रहा नाना प्रकार के वृक्षों और लताओं से भरा शोभाशाली विन्ध्यागिरी। इधर वह प्रश्रवण गिरि है। और सामने यह महासागर लहरा रहा है।” इस तरह सबको समुद्र तट पर पहुँचा कर वह फिर गुफा में चली गई।
वानरों में निराशा
सामने विशाल महासागर को देख कर उन सबके समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे। समुद्र पार कर के अगर सीता की खोज करें तो समुद्र पार करना संभव नहीं था। वापस जाने पर सुग्रीव मार डालता। कोई अन्य रास्ता नहीं देख कर कुछ लोग फिर से स्वयंप्रभा की गुफा में जाने का राय देने लगे। हनुमान ने सबको समझाया। अब सब वहीं उपवास द्वारा प्राण त्याग करने की बात करने लगे। मृत्यु की इच्छा से सब वानर समुद्र तट पर पूर्व की तरफ मुँह करके बैठ गए।
संपाती गिद्ध से भेंट
जब सब वानर इस तरह आमरण उपवास पर बैठे हुए थे, तब विंध्य गिरि के गुफा से एक विशालकाय गिद्ध निकल कर वहाँ आ गया। वह जटायु के बड़े भाई संपाती थे। इतने सारे वानर को एक पर्याप्त भोजन मान कर वे प्रसन्न हो गए।
अपनी मृत्यु को निकट देख कर युवराज अंगद दुखी होकर अपनी मृत्यु को व्यर्थ बताने लगे। उन्हे जटायु की याद आ गई जिन्होने राम का कार्य करते हुए प्राण त्यागे थे। वानरों द्वारा दुख प्रकट करते हुए कहे गए वचनों में जटायु का नाम आया। जटायु का नाम सुनकर और उन सब को इतने व्यथित देख कर संपाती की प्रसन्नता जाती रही। वे क्षुब्ध हो गए। उन्होने जटायु के विषय में पूछना शुरू किया। जटायु उनके छोटे भाई थे।
संपाती द्वारा वानरों को सीता की सूचना देना
संपाती के आग्रह पर अंगद ने संपाती को पर्वत शिखर से उतार दिया। पूछे जाने पर वानरों ने सीता हरण, जटायु मरण से लेकर उन सबके आमरण उपवास पर बैठने का सारा वृतांत सुना दिया। रावण द्वारा अपने भाई की हत्या का समाचार सुन कर वह बहुत दुखी हुए। पंख जल जाने और वृद्धावस्था के कारण अब वे शरीर से इतने सक्षम नहीं थे कि भाई का बदला ले सके। पर वे उन सबकी सहायता करना चाहते थे, जो उनके भाई के हत्यारे को उसके किए का दण्ड दे सके।
संपाती ने बताया कि पर्वत शिखर पर बैठे हुए उन्होने रावण को एक स्त्री को लाते हुए देखा था। वह स्त्री पीले रंग की साड़ी पहने थी और हा! राम, हा! राम पुकार रही थी। वह स्त्री सीता ही होगी। रावण ने उन्हे ले जाकर लंका में नजरबंद कर रखा थी। वह वहाँ बहुत कष्ट से दिन बिता रही थी। उसने लंका की दूरी और लंका नगर की विशेषताएँ भी बताया। साथ ही रावण के घर का पता भी बता दिया। संपाती के पुत्र सुपार्श्व ने भी रावण को एक स्त्री को बलपूर्वक ले जाते देखा था।
वानरों की सहायता से संपाती ने समुद्र तट पर जाकर अपने भाई जटायु को जलांजलि दिया। संपाती ने उन सब को अपनी आत्मकथा भी सुनाया। चंद्रमा नामक एक मुनि ने उन्हे राम के कार्य में सहायता करने तक जीवित रहने के लिए कहा था। इस सहायता के बाद उनके नए पंख उगने का आशीर्वाद भी दिया था।
वानरों में पुनः उत्साह
वानरो से बात करते-करते संपाती के नए पंख उग आए और वे अपने शरीर में ऊर्जा का अनुभव करने लगे। उनका यह कायाकल्प देख कर वानरों में भी नया उत्साह भर गया। वे सब फिर से राम के कार्य के लिए उद्योगशील हो गए। नए पंख पाकर सबको आशीर्वाद देते हुए संपाती भी पर्वत शिखर की तरफ उड़ चले।
हनुमान द्वारा लंका में सीता की खोज करना
यहाँ से आगे की यात्रा हनुमान ने अकेले ही सीता की खोज में की।

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