कृष्ण का गोविंद पद पर अभिषेक किसने और क्यों किया था? – भाग 24

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श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन उठाने के बाद इंद्र का पश्चाताप

देवराज इंद्र ने क्रोध और अभिमान में आकर ब्रज-भूमि को डुबाने के लिए अपने प्रलयकारी मेघों को भेज दिया था, लेकिन बाद में जब उनका अहंकार टूटा, तो उन्हें अपनी भूल पर तीव्र पश्चाताप हुआ। वे क्षमा माँगने के लिए सीधे श्रीकृष्ण के पास आए। गोलोक से कामधेनु गाय भी उसी समय श्रीकृष्ण को बधाई देने के लिए वहाँ आ पहुँचीं।

लज्जित इंद्र ने एकांत स्थान में जाकर श्रीकृष्ण के चरणों को अपने मुकुट से स्पर्श किया और हाथ जोड़कर उनकी स्तुति की। भगवान ने इंद्र से कहा कि वे अपने ऐश्वर्य और धन के मद में मतवाले हो रहे थे, इसलिए उन्होंने उनका यज्ञ भंग कर उन पर अनुग्रह किया था, ताकि वे हमेशा अपने कर्तव्य को याद रखें और अहंकार से दूर रहें।

श्रीकृष्ण ने इंद्र को अपनी राजधानी अमरावती लौटने तथा भविष्य में उनके आदेशों का अभिमानरहित होकर निरंतर पालन करते रहने का आदेश दिया।

कामधेनु द्वारा कृष्ण को ‘गोपेंद्र’ पद देना

कृष्ण का गोविंद पद पर अभिषेक

श्रीकृष्ण जब इंद्र को इस प्रकार समझा ही रहे थे, तभी कामधेनु ने अपनी संतानों के साथ गोप-वेशधारी श्रीकृष्ण की वंदना की। कामधेनु ने कहा कि “इंद्र भले ही तीनों लोकों के राजा बने रहें, किंतु हमारे वास्तविक स्वामी और इंद्र तो आप ही हैं। अतः आप गौ, ब्राह्मण, देवता और साधुजनों की रक्षा के लिए हमारे ‘गोपेंद्र’ बन जाइए। हम सब गौएँ ब्रह्माजी की प्रेरणा से आपको अपना इंद्र मानकर आपका अभिषेक करना चाहती हैं। हे विश्वात्मन! आपने तो पृथ्वी का भार उतारने के लिए ही यह दिव्य अवतार लिया है।”

कामधेनु और इंद्र द्वारा कृष्ण का अभिषेक

ऐसा कहकर कामधेनु ने अपने दुग्ध से श्रीकृष्ण का अभिषेक किया। उनकी प्रेरणा से ऐरावत हाथी द्वारा अपनी सूँड में लाए गए आकाशगंगा के पवित्र जल से देवराज इंद्र ने भी श्रीकृष्ण का अभिषेक किया और उन्हें ‘गोविंद’ नाम से संबोधित किया।

उस समय वहाँ नारद, तुम्बुरु आदि गंधर्व, विद्याधर, सिद्ध और चारण भी पधारे हुए थे। वे सब श्रीकृष्ण के यशस्वी गुणों का गान करने लगे और अप्सराएँ आनंदपूर्वक नृत्य करने लगीं। देवतागण उन पर नंदनवन के सुंदर पुष्पों की वर्षा करने लगे। इस प्रकार तीनों लोकों में परमानंद की बाढ़ आ गई।

इस प्रकार, इंद्र ने गौ और गोकुल के स्वामी श्रीगोविंद का अभिषेक किया और उनकी अनुमति पाकर देवताओं तथा गंधर्वों के साथ अपने लोक स्वर्ग को प्रस्थान किया।

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