जैसे सीता की परीक्षा और निर्वासन के कारण राम को स्त्री विरोधी माना जाने लगा उसी तरह शंबूक की हत्या के कारण उन्हें शूद्र विरोधी भी कई लोग मानते हैं। शंबूक वध का प्रसंग रामायण के विवादास्पद उत्तरकाण्ड में है। कथा के अनुसार शंबूक की हत्या राम के केवल इस कारण कर दिया कि वह शूद्र होकर भी तपस्या कर रहा था। पर अधिकांश शोधकर्ता इस प्रसंग को बाद में जोड़ा गया मानते हैं, मूल वाल्मीकि रामायण का भाग नहीं। वाल्मीकि रामायण के उत्तर कांड में शंबूक वध का प्रसंग इस तरह है:
ब्राह्मण का राम से मिलना
प्रसंग के अनुसार एक बार जब राम अपने दरबार में बैठे थे तब एक ब्राह्मण दरबार में आया। उसने उन पर आरोप लगाया कि उनके कुशासन के कारण उसके युवा बेटे की मृत्यु हो गई।
ब्राह्मण पुत्र की मृत्यु का कारण पता करना
राम ने तुरंत मंत्रियों की बैठक बुलाया। वे सब ये पता करने का प्रयास कर रहे थे कि उनके शासन में ऐसी क्या त्रुटि रह गई है जिससे उनकी प्रजा को कष्ट हो रहा है। क्योंकि माना जाता था राजा के पाप के कारण प्रजा को कष्ट होता है।
नारद जी द्वारा कारण बताना
तभी नारद जी आए। उन्होने बताया कि रामराज में तप से संबन्धित नियम का उल्लंघन हो रहा था। सतयुग में ब्राह्मण, त्रेता में ब्राह्मण और क्षत्रिय, द्वापर में इन दोनों के साथ वैश्य तथा कलयुग में शूद्र सहित सभी वर्ण तपस्या के अधिकारी है। शंबूक त्रेता में शूद्र होकर तपस्या कर रहा था इसलिए मृत्युदंड का पात्र था।
राम द्वारा शंबूक को मृत्युदंड देना
राम ने पता लगाया कि क्या सच में शंबूक कहीं तपस्या कर रहा था? जब पता चला कि यह सच था। तो वह स्वयं उस स्थान पर गए जहां शंबूक तपस्या कर रहा था। उन्होने पहले इस बात को सुनिश्चित किया कि वह वास्तव में शूद्र वर्ण का ही था। यह सुनिश्चित होने पर राम ने शंबूक की हत्या कर दी।
राम के इस कार्य पर देवता आए और इस कार्य के लिए उनकी प्रशंसा की। इस कार्य से देवता भी प्रसन्न हुए। उस ब्राह्मण का बेटा भी जीवित हो गया।
शंबूक प्रसंग के संबंध में विवाद
उत्तरकाण्ड के अधिकांश प्रसंग की तरह शंबूक प्रसंग को भी रामायण में बाद जोड़ा गया अंश माना जाता है। ऐसा मानने के निम्नलिखित कारण हैं:
1. संपूर्ण उत्तरकाण्ड या कम-से-कम उसका अधिकांश भाग कई प्रमाणों के आधार पर रामायण का मूल भाग नहीं बल्कि बाद में जोड़ा गया भाग माना जाता है। उत्तरकाण्ड की भाषा, लेखन शैली और विचार अन्य कांड से बहुत भिन्न हैं।
2. शंबूक प्रसंग रामायण के अन्य प्रसंगों में व्यक्त विचारों से बिलकुल अलग है। रामायण के अन्य किसी कांड में शूद्र के प्रति ऐसे किसी विचार का प्रतिपादन नहीं किया गया। कुछ प्रसिद्ध उदाहरण इस प्रकार हैं:
(1) शबरी, जो कि शबर जाति की भील यानि कि शूद्र थी, को राम ने उच्च आदर दिया। उनके यहाँ भोजन किया। राम ही नहीं उनसे पहले मतंग आदि ऋषियों ने भी उन्हें निस्वार्थ सेवा और आध्यात्मिक जिज्ञासा के कारण बहुत आदर दिया था। मतंग ऋषि स्वयं ब्राह्मण माता और नाई पिता की संतान थे।
(2) श्रवण कुमार के पिता को वैश्य और माता को शूद्र कहा गया है। वे दोनों मुनि की तरह तपस्या करते थे। राजकुमार दशरथ सहित अन्य लोग भी उन्हें मुनि की तरह सम्माननीय मानते थे।
(3) दशरथ के प्रधान मंत्री सुमंत्र सूत जाति में उत्पन्न थे। सूत रथ चलाने और उसकी मरम्मत करने वाली जाति थी। वैदिक काल में इसे सम्मानीय स्थान प्राप्त थे लेकिन बाद में श्रम की महता घटने के साथ-साथ शारीरिक श्रम करने वाले समुदायों/जातियों का स्थान समाज में निम्न होता गया और सूत शूद्र की श्रेणी में पहुँच गया। लेकिन सुमंत्र अयोध्या के प्रधान मंत्री और राजा दशरथ का सबसे प्रिय मित्र थे। उन्हें किसी भी समय राजमहल के किसी भी स्थान में जाने की अनुमति थी। वे राम के समय में भी इसी पद पर बने रहे थे। राम चारों भाई उन्हें पिता की तरह आदर देते थे। राम का वनगमन, भरत का राम को लाने के लिए वन गमन, राम का अयोध्या में स्वागत जुलूस, सीता का निर्वासन आदि सभी महत्वपूर्ण समय पर रथ सुमंत्र ने ही चलाएँ थे।
(4) राम ने संपूर्ण रामायण में व्यक्ति के चरित्र और कर्तव्य को महत्व दिया है, उसके जन्म को नहीं। उनके मित्र मण्डली में अनेक जाति के मित्र थे। निषादराज उनका परम मित्र थे। यह मित्रता गुरुकुल से शुरू हुई जो कि आजीवन चलता रहा।
(5) राम के राज्य में किसी भी प्रजा को किसी भी तरह का दैविक, दैहिक और भौतिक कष्ट नहीं होने का वर्णन है। अगर सीता के निर्वासन वाले भाग को सत्य माने (हालाँकि शंबूक की तरह यह भाग भी बाद में जोड़ा गया ही लगता है) तो प्रजा के एक व्यक्ति (लोकप्रिय रूप से एक धोबी, पर रामायण में “धोबी” नहीं लिखा है) द्वारा गलत कहने से अपनी प्रिय पत्नी को जिस राम ने निर्वासित कर दिया, जो राम एक कुत्ते को न्याय देने के लिए भी सभाभवन में जाते हैं, वो वैश्यों और शूद्रों की इतनी बड़ी संख्या के दुखों से अप्रभावित रहें, यह स्वाभाविक नहीं लगता है।
(6) राम के अंत से समय उनके साथ एक विशाल प्राणी समूह ने सरयू में जल समाधि ले ली। इसमें मनुष्य ही नहीं बल्कि पशु-पक्षी आदि भी शामिल थे। उनके परिवार के सदस्यों के अलावा प्रजा के लोग भी उनके साथ थे, जो किसी भी हाल में राम के बिना जिंदा नहीं रहना चाहते थे। राम के बहूत समझाने पर भी वे नहीं माने। अगर प्रजा का इतना बड़ा समूह किसी राजा के साथ अपनी जान देने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ हो तो वह राजा समस्त प्रजाजन में अत्यंत लोकप्रिय रहा होगा। उनके साथ जल समाधि लेने वालों में शूद्र और वैश्य जाति के उनके सेवक भी थे। तपस्या करने के लिए किसी शूद्र की हत्या करने वाले राजा के लिए प्रजा, विशेष कर वैश्य और शूद्र प्रजा, का ऐसा भाव संभव नहीं होता।
(7) समस्त रामायण में तपस्वी शूद्र को सम्मान दिया गया है। अचानक उत्तरकाण्ड में एक ऐसा कथा आता है, जिसमे तपस्या करने के अपराध में “मृत्युदंड” राम द्वारा दिया जाता है। यह कथा का मूल भाग नहीं है। बल्कि राजा के रूप में राम के कुछ कार्यों का वर्णन करते हुए यह कथा सुनाया गया है। स्पष्टतः बाद के समय में शूद्रों को दमित करने के लिए इस कथा को रामायण में शामिल किया गया होना अधिक समीचीन प्रतीत होता है।

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