हनुमान ने राम की आज्ञा के अनुसार उनके अयोध्या आगमन की शुभ सूचना नंदीग्राम में जाकर दे दिया। उन्होने चित्रकूट के बाद के राम वनवास का सारा समाचार भी उन्हें बताया। राम के पुष्पक विमान द्वारा अयोध्या आगमन की खबर जल्दी ही सारी अयोध्या में फैल गई। उनके आगमन की स्वागत के लिए रास्तों को और सारे नगर को सजाया गया। राम पहले भरत से मिलने नंदीग्राम ही जाते, इसलिए राज परिवार के सभी सदस्य, अधिकारी जन, गुरुजन, प्रजा के भी अनेक लोग उनके दर्शन और स्वागत के लिए नगर से बाहर नंदीग्राम के पास ही आ गए। नंदी ग्राम से अयोध्या नगर का समस्त रास्ता सजा दिया गया।
राम का अयोध्या आगमन
पुष्पक विमान के शोर से लोगों को राम का नजदीक आ जाना ज्ञात हो गया। विमान देखते ही सभी लोगों ने एक साथ ज़ोर से हर्षनाद किया। दूर से विमान के ऊपरी भाग में बैठे राम के दर्शन हुए। अयोध्या से आए हुए लोग अपने-अपने वाहनों से उतर कर राम के दर्शन करने लगे।
सुग्रीव सहित सभी वानर इच्छानुसार रूप धारण करने वाले थे। इस समय वे सब मनुष्य के रूप में थे।
भरत राम की ओर देखते हुए हाथ जोड़ कर खड़े हो गए। दूर से ही उन्होने अर्घ्य-पाद्य आदि से राम की विधिवत पूजा किया।
भरत का सबसे मिलना
विमान धरती पर उतरा। भरत ने विमान में ही जाकर राम को साष्टांग प्रणाम किया। राम ने उन्हें उठा कर हृदय से लगा लिया। लक्ष्मण ने भरत को प्रमाण किया। भरत ने उन्हें उठा कर गले से लगा लिया। फिर उन्होने सीता को प्रणाम किया।
इसके बाद भरत सुग्रीव, अंगद आदि सबसे मिले और सबका प्रेम से आलिंगन किया। सुग्रीव को गले लगा कर भरत ने उन्हे अपना पाँचवा भाई बताया। उन्होने विभीषण का भी बहुत सम्मान किया।
शत्रुघ्न ने भी अपने भाइयों और भाभी को प्रणाम किया।
राम का सबसे मिलना
भरत-शत्रुघ्न विमान में ही जाकर सबसे मिल लिए। इसके बाद राम विमान से उतरे और सभी माताओ से मिले। अयोध्या के नागरिकों ने उनका अभिनन्दन और स्वागत किया।
भरत द्वारा राम का चरण पादुका लौटाना
भरत ने राम का सिंहासनस्थ पादुका लाकर उनके चरणों मे रख दिया। और बोले “मेरे पास धरोहर के रूप में रखा आपका सारा राज्य आज मैंने आपके चरणों में लौटा दिया। आज मेरा मनोरथ सफल हुआ।”
सभी का नंदीग्राम जाना
इसके बाद राम भरत के साथ ही विमान द्वारा सेना सहित नंदीग्राम स्थित उनके आश्रम पर गए। आश्रम पहुँच कर सब विमान से उतर गए।
पुष्पक विमान को वापस कुबेर के पास भेजना
राम जिस पुष्पक विमान से आए थे, उसे रावण ने अपने भाई कुबेर से छीना था। उससे राम जल्दी अयोध्या आ गए। जब वे नंदी ग्राम उतरें तब विमान को उसके वास्तविक स्वामी कुबेर के पास भेज दिया।
नंदीग्राम की सभा
विमान को वापस भेजने के बाद सब कोई भरत के आश्रम में आएँ। आश्रम में गुरु को प्रमाण कर सभी आसन पर बैठे। भरत ने राम को उनका राज्य लौटाने और उनके राज्याभिषेक की बात की।
निपुण नाई बुलाए गए। सबसे पहले भरत, फिर लक्ष्मण, फिर सुग्रीव, विभीषण आदि को स्नान कराया गया। इसके बाद चारों भाइयों के जटा सुलझाए गए। भाइयों के बाद राम ने अपना जटा सुलझाया। स्नान के बाद चारों भाइयों ने राजसी वस्त्र और आभूषण धारण किया। रानियों ने अपने हाथों से सीता का शृंगार किया।
कुलगुरु वशिष्ठ के नेतृत्व में राम के राज्याभिषेक के लिए विचार-विमर्श हुआ और आवश्यक निर्देश दिए गए।
सुंदर झांकी के रूप में राम का राजधानी नगर में प्रवेश और लोगों द्वारा उनका स्वागत
शत्रुघ्न की आज्ञा से सुमंत्र सुंदर रथ ले आए। हनुमान भी साथ थे। भरत सारथी की भूमिका में थे। लक्ष्मण चँवर और शत्रुघ्न छत्र लिए हुए थे। मंत्री, ब्राह्मण और प्रजाजन उन्हे घेरे हुए थे। उन सबके आगे वाद्य यंत्र बजाते हुए प्रजाजन जा रहे थे। मंगल वस्तुएं लिए भी अनेक लोग चल रहे थे।
सुग्रीव शत्रुंजय नामक एक बड़े हाथी पर थे। अन्य वानर नौ हजार हाथियों से चले। इस समय सभी वानर मनुष्य वेश में थे। सुग्रीव की पत्नियाँ और सीता जी भी सवारियों पर नगर देखने की उत्सुकता में चली।
यह सुंदर झांकी अयोध्या नगर के लिए चली। लोग आगे बढ़ कर राम को बधाई देते और राम सबका अभिनन्दन करते। पुरवासी भी भाइयों से घिरे राम के पीछे-पीछे प्रेमवश चलने लगते।
राम अपने मंत्रियों से सुग्रीव, हनुमान आदि से मित्रता और उनके पराक्रम के विषय में भी बात करते जा रहे थे। सभी विस्मय से सारा प्रसंग सुन रहे थे।
इस प्रकार राम ने भाइयों, अपने मित्रों और सीता के साथ अयोध्या नगर मे प्रवेश किया। नगरवासियों ने अपने घरों पर लगी पताकाएँ उनके स्वागत के लिए ऊँची कर दी। इस झांकी के साथ राम अपने पिता के राजमहल में आए।
अतिथियों के ठहरने की व्यवस्था की गई। राम के आदेशानुसार भरत ने बड़े प्रेम से सुग्रीव को राम के विशेष महल में ठहराया।
राम का राज्याभिषेक
अगले दिन भव्य रीति से राम का राज्याभिषेक हुआ। शत्रुघ्न उनके सिर पर छत्र लेकर खड़े थे। एक तरफ सुग्रीव और दूसरी तरफ विभीषण उनका चँवर डुला रहे थे। राज्याभिषेक की सुंदर झांकी देखने देवता, गंधर्व और अप्सरा आदि भी आए।
उपहारों का आदान-प्रदान
राज्याभिषेक के अवसर पर वायु देव ने इन्द्र की प्रेरणा से सौ सुवर्णमय कमलों से बनी हुई एक माला और सब प्रकार के रत्नों से युक्त एक मुक्ताहार राम को उपहार में दिया। वायु देव से मिले मुक्ताहार को राम ने सीता को अन्य वस्तुओं के साथ उपहार में दे दिया। सीता हनुमान को कुछ उपहार देना चाहती थी। इसलिए उन्होने पति की ओर देखा। उनके मनोभावों को समझ कर राम ने उनसे कहा कि वे जिसे देना चाहे दे सकती हैं। सीता ने वह हार हनुमान को दे दिया।
राम ने भी इस अवसर पर ब्राह्मणों को बहुत सा दान दिया।
राम ने अपने मित्र सुग्रीव को सोने और मणियों से बनी एक माला उपहार में दिया। उन्होने अंगद को नीलम जड़ित दो अंगद यानि बाजूबंद दिया। (बाजूबंद को संस्कृत में अंगद कहते हैं। अंगद बचपन से ही एक विशेष प्रकार का अंगद यानि बाँह पर पहनने वाला आभूषण पहनते थे, इसीलिए उनका यह नाम पड़ा था।)
राम ने विभीषण, जांबवान, नील, द्विद, मैंद आदि सभी का उचित उपहार देकर सत्कार किया।
राम का राज्याभिषेक उत्सव देख कर सभी वानर अपनी पत्नियों के साथ किष्किन्धा चले गए। विभीषण भी लंका के लिए विदा हुए।
इस तरह राम ने अयोध्या के राजा का कार्यभार संभाल लिया। उन्होने भरत को युवराज बनाया। उन्होने दीर्घकाल तक राज्य किया। उन्होने ऐसा राज्य संचालन किया कि राम राज्य आदर्श शासन का अभिप्राय बन गया।

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