भरत और अयोध्यावासियों के चित्रकूट आने का प्रभाव
भरत आदि परिजनों के जाने के बाद राम-लक्ष्मण उदास और भावुक थे। कुछ समय बाद उन्होने ध्यान दिया कि चित्रकूट में रहने वाले मुनि लोग अन्य स्थान पर जा रहे थे।
पूछने पर पता चला कि खर नामक एक राक्षस, जो कि रावण का भाई है, उससे इन लोगों को ख़तरा था। भरत के आने के बाद से यह सर्वविदित हो गया था कि अयोध्या के राजकुमार इस वन में रहते है। विश्वामित्र के यज्ञ में राक्षसों के मारने के कारण राक्षस उनसे वैर रखते थे। ऐसी स्थिति में उन पर राक्षसों का ख़तरा और बढ़ गया था।
उन मुनियों के अन्यत्र चले जाने के बाद राम को भी अब चित्रकूट रहना उचित नहीं लगा। एक तो यहाँ अयोध्या के उनके परिजन आए थे। यहाँ रहने से उनका स्मरण उन्हे अधिक होता। दूसरा, अयोध्या के सेना और इतने अधिक पशुओं के कारण उस क्षेत्र में गंदगी हो गई थी। तीसरा, उनके यहाँ रहने से स्थानीय लोगों को ख़तरा भी था। इसलिए राम ने अन्य स्थान पर जाने का निश्चय किया।
ऐसा निश्चय कर राम लक्ष्मण और सीता उस वन को छोड़ कर निकल गए।
ऋषि अत्रि और अनसूया से भेंट
रास्ते में वयोवृद्ध ऋषि अत्रि का आश्रम था। वे तीनों वहाँ उनसे मिलने गए। अत्रि की पत्नी अनसूया भी बहुत बड़ी तपस्विनी थी।
अत्रि-अनसूया ने इन तीनों का स्वागत और सत्कार अपने बच्चों की तरह किया। अनसूया ने सीता को उपहार के रूप में ऐसे वस्त्र और आभूषण दिया जो कभी कभी मैले या पुराने नहीं होते। आभूषण फूलों के होकर भी मुरझाते नहीं। उस रात तीनों ने वही विश्राम किया।
राम का दंडकारण्य जाना
अगले दिन वे सब दंड्कारण्य नामक वन के लिए चले। यह वन चित्रकूट की अपेक्षा अधिक दुर्गम था। अत्रि ने उस वन के राक्षसों और अन्य खतरों के विषय में उन्हें बताया।
दंड्कारण्य में राम अपने भाई और पत्नी के साथ विभिन्न ऋषि-मुनियों से मिलते और उनसे सत्कार पाते हुए चले जा रहे थे। रास्ते में राक्षस विराध में उनपर हमला कर दिया। उन्होने उसका वध कर दिया। अपने लोक जाने से पहले विराध ने उनसे शरभंग ऋषि के आश्रम जाकर उनसे मिलने के लिए कहा।
राम का शरभंग मुनि से भेंट
विराध को मुक्त कर उसके कथनानुसार राम, लक्ष्मण और सीता– तीनों शरभंग मुनि के आश्रम गए। जिस समय वे वहाँ पहुँचे, देवराज इंद्र आश्रम में मुनि से बात कर रहे थे। आकाश में उनका दिव्य रथ और अन्य कई देवता खड़े थे। इन्द्र ने राम को आते देख लिया। लेकिन यह समय उनसे मिलने के लिए उपयुक्त नहीं समझा। रावण वध के बाद उनके दर्शन करने की बात कह कर वे राम से बिना मिले ही सभी देवताओं के साथ चले गए।
इन्द्र के जाने के बाद राम, लक्ष्मण और सीता मुनि शरभंग के आश्रम में आए। मुनि ने उन सबका आतिथ्य सत्कार किया। इन्द्र के आने का कारण पूछने पर मुनि ने बताया कि अपने तप के कारण उन्हे ब्रह्म लोक की प्राप्ति हुई है। इन्द्र उन्हे वहीं ले जाने आए थे। पर जब मुनि को पता चला कि राम निकट ही आए हुए हैं, तो वे उनके दर्शन किए बिना ब्रह्मलोक जाने के लिए तैयार नहीं हुए।
राम द्वारा अपने रहने के लिए उपयुक्त स्थान पूछने पर मुनि ने उन्हे मुनि सुतीक्ष्ण से मिलने के लिए कहा। उन्होंने सुतीक्ष्ण के आश्रम जाने का मार्ग भी बता दिया।
लेकिन उन्होने राम से तब तक उनके पास ठहरने के लिए कहा जब तक वे अपना शरीर त्याग कर ब्रह्मलोक नहीं चले जाते। यह कह कर शरभंग मुनि ने अग्नि प्रज्वलित किया और राम को देखते हुए उसमें प्रवेश कर गए। संपूर्ण शरीर भस्म हो जाने के बाद अग्नि शिखा से वे एक सूक्ष्म दिव्य देह से प्रकट हुए और ब्रह्मलोक चले गए।
तब तक बहुत से ऋषि-मुनि उस आश्रम में आ गए थे। उन्होने राम से राक्षसों से अपनी रक्षा की प्रार्थना की। राम उन सब को आश्वासन देकर मुनि शरभंग के बताए रास्ते से सुतीक्ष्य के आश्रम पहुँचे।
राम का सुतीक्ष्य मुनि से भेंट
सुतीक्ष्य ने उन तीनों का बहुत आदर-सत्कार किया। उन्होने भी बताया कि उनकी प्रतीक्षा में ही उन्होने शरीर त्याग नहीं किया था। उनके द्वारा अपने आश्रम में ही रहने के आग्रह को तो राम ने स्वीकार नहीं किया लेकिन उस रात वही रहे।
ऋषियों द्वारा राम से अपने-अपने आश्रम में रहने का आग्रह
सुबह उन्होने मुनि से विदा माँगा। तब तक दंड्कारण्य में रहने वाले अनेक ऋषि मुनि राम को अपने आश्रम में ले जाने के लिए सुतीक्ष्य मुनि के आश्रम में आ गए थे। सुतीक्ष्ण ने राम से अन्य ऋषियों के आश्रम में घूमने के बाद पुनः अपने आश्रम में आने का वचन लिया।
सीता द्वारा राम से अहिंसा के पालन का आग्रह और राम द्वारा इसका खण्डन
वहाँ से जब वे तीनों आगे बढ़े तब रास्ते में सीता ने राम से निरपराध प्राणी (राक्षस) को नहीं मारने के लिए और अहिंसा धर्म का पालन करने के लिए आग्रह किया। लेकिन राम ने ऋषियों की रक्षा के लिए राक्षसों के वध की अपनी प्रतिज्ञा को दुहराया और इस पर दृढ़ रहने का विचार प्रकट किया।
10 वर्षों तक राम का दंडकारण्य में विभिन्न मुनियों के आश्रम में रहना
इसके बाद तीनों दंड्कारण्य के पंचाप्सर आदि तीर्थ और अनेक ऋषि मुनियों के आश्रम गए। कई मुनियों के आश्रम में कई महीने रहे। इस तरह दंड्कारण्य में घूमते हुए उन्हें दस वर्ष बीत गए।
दंडकारण्य छोड़ने का विचार
वनवास की अधिकांश अवधि बीत चुकी थी। राम का लक्ष्मण और सीता के साथ वन में रहते हुए अपने भक्त मुनियों को दर्शन देने का कार्य तो पूरा हो चुका था। अब राक्षस वध का कार्य बचा हुआ था। अकारण राक्षसों का वध धर्म के प्रतिकूल होता, अतः राम राक्षसों को अवसर देना चाहते थे ताकि वे पहले आक्रामक कार्यवाई करें। अतः अब वे दंडकारण्य छोड़ कर ऐसे ही किसी उपयुक्त स्थान पर जाना चाहते थे। ऋषि अगस्त की सलाह से उन्होने पंचवटी को ऐसे स्थान के रूप में चुना।
सुतीक्ष्य मुनि के आश्रम में दुबारा आना
राम दंडकारण्य आने के बाद सबसे पहले शरभंग और उनके बाद उनके शिष्य सुतीक्ष्य मुनि के आश्रम जाकर उनसे मिले थे। यहीं से अन्य ऋषि-मुनियों के निमंत्रण पर उनके आश्रम गए लेकिन उन्होने सुतीक्ष्य मुनि से जाने से पहले उनसे मिलने का वचन दिया था। इसलिए जब उन्होने दंडकारण्य छोड़ने का विचार किया तो फिर अपने वचन के अनुसार सुतीक्ष्य मुनि के आश्रम पहुंचे।
उनके आश्रम में वे कुछ समय तक रहे। इसी आश्रम में रहते समय उन्होने अगस्त्य मुनि और उनके भाई के विषय में सुना जिनका आश्रम अधिक दूर नहीं था। सुतीक्ष्य से अनुमति लेकर और मार्ग पूछ कर वे उनके आश्रम पर गए।
राम पहले अगस्त्य के भाई के आश्रम में गए। फिर वहाँ रातभर रुकने के बाद अगस्त्य के आश्रम में गए। अगस्त्य उनसे मिलने के लिए पहले से ही बहुत उत्सुक थे। अतः उन्हे आया देख कर बहुत खुश हुए।
राम का अगस्त मुनि से मिलना
समुचित आतिथ्य-सत्कार और कुशल समाचार के बाद अगस्त्य ने राम को सोने और हीरे जड़े हुए भगवान विश्वकर्मा का बनाया हुआ वह दिव्य धनुष दिया जो उन्हे भगवान विष्णु ने दिया था। उन्होने ब्रह्मा द्वारा दिया हुआ बाण और इंद्र द्वारा दिया हुआ कभी खाली न होने वाले दो तरकश भी दिये। इसके अतिरिक्त सोने के मूठ वाला तलवार भी दिया। ये सभी दिव्य अस्त्र उन्हे राक्षसों के वध में काम आने वाला था। राम के पूछने पर अगस्त मुनि ने ही उन्हें पंचवटी में रहने का सुझाव दिया।
राम का पंचवटी आगमन और जटायु से भेंट
पंचवटी के रास्ते में राम ने एक बहुत बड़े पक्षी को जंगल में बैठे देखा, जो दिखने में गिद्ध लग रहा था। उसके इतने बड़े आकार को देख कर उन्हे राक्षस होने का संदेह हुआ। इसलिए राम ने उस पक्षी से पूछा “आप कौन हैं?” उस पर उस पक्षी ने बड़ी मधुरता से उत्तर दिया “बेटा! मुझे अपने पिता का मित्र समझो”।
यह सुन कर राम ने शांत भाव से उनका कुल और नाम पूछा। अपना परिचय देने के क्रम में उस विशाल पक्षी ने समस्त प्राणियों की उत्पत्ति का क्रम बता दिया। इतना लंबा-चौड़ा उत्पत्ति क्रम बताने के बाद उसने बताया कि विनीता के पुत्र अरुण के दो पुत्र हुए- संपाति और जटायु। उन विशाल पक्षी का नाम जटायु था और वे गिद्ध थे। वे अरुण के पुत्र थे।
गिद्ध जटायु ने राम को उनके निवास में सहायता करने और दोनों भाइयों की अनुपस्थिति में सीता की रक्षा करने का भी वचन दिया। यह सुन कर राम बड़े खुश हुए और उन्हे गले लगा कर अपने पिता से उनकी मित्रता के विषय में पूछा।
जटायु ने ही अपने आवास के पास एक रमणीय स्थल पर पर्णकुटी बनाने का सुझाव उन्हें दिया। अपने मित्र राजा दशरथ के बच्चे होने के नाते उन्हें जटायु ने अपने बच्चों की तरह ही माना और हर तरह से उनकी सुरक्षा और सहायता का आश्वासन दिया। इसी वचन को पूरा करते हुए रावण से सीता को बचाने के प्रयास में बाद में वे मृत्यु को प्राप्त हुए थे।
पंचवटी में गोदावरि तट पर पर्णकुटी का निर्माण
बातचीत करते हुए राम, लक्ष्मण, सीता और जटायु पंचवटी में घूमते रहे। फिर एक उपयुक्त स्थान देख कर राम ने वहाँ पर्ण कुटी के निर्माण के लिए लक्ष्मण से कहा। गोदावरी नदी उनके कुटी के पास ही था।
मिट्टी की दीवार और खंभे लगा कर लक्ष्मण ने एक सुंदर और बड़ा कुटी तैयार कर लिया। गोदावरि में स्नान करके विधिवत रूप से वास्तुशान्ति करके लक्ष्मण ने वह आश्रम राम को दिखाया। इस सुंदर कुटी को देख कर राम ने पुरस्कार स्वरूप लक्ष्मण को गले लगा कर उनकी बहुत प्रशंसा की। इस तरह उस कुटी में गृह प्रवेश हुआ और तीनों लोग उसमे आराम से रहने लगे।
