शबरी के आश्रम राम क्यों गए थे?-भाग 35

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शबरी रामायण के उन पात्रों में से है जिनके विषय में आम जन में जो छवि से उससे बिल्कुल ही अलग छवि वाल्मीकि रामायण में है। आम जन में जो छवि है वह तुलसीदास के रामचरित मानस के आधार पर है। इसी के आधार पर लोग मानते हैं कि वह एक अनपढ़ और गँवार महिला थी जिसे इतना भी नहीं पता था कि जूठे फल भगवान को भोग नहीं लगाना चाहिए। लेकिन उसने इतने प्रेम से वह फल दिया कि राम ने जूठे बेर के फल को बड़े ही प्रेम से खाया। लेकिन वाल्मीकि रामायण इस छवि के अलग उनकी छवि प्रस्तुत करता है।

शबरी कौन थी?

रामायण या रामचरित मानस- दोनों में ही शबरी के प्रारम्भिक जीवन के विषय में कुछ नहीं कहा गया है। लेकिन अन्य कुछ ग्रंथों में उनके विषय में जो जानकारी है उसके अनुसार वह भील वनवासियों की एक शाखा शबर जाति के मुखिया (राजा) की पुत्री थी। शबर भील दंडकारण्य में ही कहीं रहते थे।

उसका नाम श्रमणा शबरी था। वह यद्यपि पढ़ी-लिखी नहीं थी। उसने शास्त्रों को नहीं सुना था। लेकिन उसमें गहरी आध्यात्मिक अभिरुचि थी। वह ऋषि-मुनियों के संगत में रहना और भगवान की चर्चा सुनना चाहती थी।

श्रवणा का विवाह किसी भील मुखिया के पुत्र (राजकुमार) से तय हुआ। वह एक तो गृहस्थी में नहीं पड़ना चाहती थी। दूसर, उसके विवाह के अवसर पर मारने के लिए बहुत से पशुओं को लाया गया था। वह नहीं चाहती थी कि वह विवाह करे और वे सब मारे जाए। अतः वह घर से निकल गई।

शबरी का मतंग ऋषि की शिष्या बनना

उस समय रिष्यमुक पर्वत के तलहटी में पंपा सरोवर के आसपास एक बड़ा ही सुंदर वन था। उस वन में ऋषि मतंग रहते थे। उनके आश्रम के कारण उस वन का नाम ही मातंग वन पड़ गया था। ऋषि के आध्यात्मिक उपलब्धि और प्रभुभक्ति की चर्चा दूर-दूर तक थी। सभवतः एक बार कुंभ के मेले या किसी ऐसे ही आयोजन में श्रवणा ने उन्हें देखा था। वह उनकी शिष्या बन कर उनसे ज्ञान प्राप्त करना चाहती थी। लेकिन उसे भय था कि जन्म से निम्न कुल का होने के कारण ऋषि उसे अपना शिष्य बनाएँगे या नहीं। इसलिए उन्होंने बिना कुछ कहे गुप्त रूप से मतंग ऋषि की सेवा करना शुरू कर दिया।

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वह प्रतिदिन सुबह उठ कर उस रास्ते हो साफ कर देती जिस रास्ते से ऋषि स्नान करने के लिए जाते थे। जब कई दिन यह क्रम अनवरत चला तब एक दिन ऋषि ने उसे रास्ता साफ करते देख लिया। पूछने पर श्रवणा ने अपनी इच्छा बताया। मतंग ऋषि श्रमणा की सेवा भाव से बहुत खुश हुए। उन्होंने उसे अपने आश्रम में रहने की अनुमति दे दी। तब से श्रमणा वहीं रहने लगी।

वह आश्रम के रहती और सभी सेवा कार्य करती। मतंग ऋषि और उनके आश्रम में आने वाले अन्य ऋषियों के वचनों को सुनती थी। शबर जाति का होने के कारण आश्रम के लोग उसे शबरी ही कहने लगे। इस तरह श्रमणा शबरी केवल शबरी नाम से ही प्रसिद्ध हो गई।

शबरी के निस्वार्थ सेवा और गुरु व भगवान की भक्ति के कारण उसके गुरु मतंग ही नहीं बल्कि उस वन में रहने वाले सभी ऋषि-मुनि उससे प्रेम करते थे और उसे आदर देते थे।

गुरु द्वारा वरदान और राम के दर्शन की बात बताना

समय आने पर जब मतंग ऋषि ने शरीर त्याग करने का निश्चय किया तब शबरी भी उनके साथ ही थी। ऋषि पद्मासन में बैठ कर जब शरीर छोड़ने के लिए उद्द्त हुए तब उन्होंने शबरी से कोई वरदान माँगने के लिए कहा। शबरी ने उनसे उनकी तरह ही पद्मासन में बैठ कर इच्छित मृत्यु का वरदान माँगा। गुरु के बिना वह भी जीवित नहीं रहना चाहती थी।

इस पर मतंग मुनि ने उन्हें इच्छित मृत्यु का वरदान देते हुए यह कहा कि वह अपने शरीर को रखे रहे। जब राम अपनी पत्नी सीता को ढूँढते हुए अपने भाई के साथ इस वन में और इस आश्रम में आएँगे। शबरी उन दोनों भाइयों की आतिथ्य-सेवा और दर्शन करे उसके बाद शरीर का त्याग करे। ऐसा कहने के बाद ऋषि ने अपने शरीर का त्याग कर दिया।

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शबरी द्वारा राम की प्रतीक्षा

तब से शबरी अपने गुरु के उसी आश्रम में राम की प्रतीक्षा करते हुए रह रही थी। इस समय राम चित्रकूट में ही थे। गुरु ने उसे यह नहीं बताया था की राम-लक्ष्मण कब आएँगे। इसलिए वह प्रतिदिन उनके स्वागत के लिए आश्रम को साफ करती और पंपा सरोवर के किनारे उगने वाले अच्छे-अच्छे फल-मूल ला कर रखती थी।

यह क्रम अनेक वर्षों तक चलता रहा। शबरी बूढ़ी हो चली। अब शरीर कमजोर हो गया। चलने के लिए लाठी के सहारे की जरूरत हो गई। फिर भी गुरु के वचन को सत्य मान कर वह उसी उत्साह से राम-लक्ष्मण के स्वागत के लिए प्रतिदिन तैयारी करती थी। अंततः वह दिन भी आ गया जब किसी ने उसे बताया कि दो सुंदर नवयुवक उसके आश्रम का पता पूछते हुए आ रहे हैं। वह समझ गई कि अब उसके प्रतीक्षा का अंत हो गया। अब राम-लक्ष्मण के दर्शन उसे होंगे।

शबरी के आश्रम में राम-लक्ष्मण का आगमन

उसकी आशा फलित हुई। राम-लक्ष्मण आए। उसने उन दोनों का स्वागत किया। उन्हें फलों का भोग लगाया। राम और शबरी में धर्म-संबंधी चर्चा हुई। राम में मातंग वन देखने की इच्छा प्रकट किया क्योंकि मतंग ऋषि का तपोभूमि होने के कारण इस वन का बहुत महत्व था। शबरी ने उन्हें अपने साथ ले जाकर वन दिखलाया। राम के पूछने पर अपने गुरुओं के विषय में बताया। उसने रिष्यमुक पर्वत पर जाने का रास्ता भी उन्हें बता दिया जहाँ जाकर उन्हें सीता की खोज के लिए सुग्रीव से मिलना था।

शबरी का शरीर त्याग

इस तरह राम-लक्ष्मण की सेवा और दर्शन करने के बाद उसने राम से उनके समक्ष ही शरीर त्याग करने की अनुमति (वरदान) मांगा ताकि उनके दर्शन करते हुए शरीर त्याग कर सके। राम ने यह दे दिया। अपने गुरु की तरह ही पद्मासन में बैठ कर अग्नि में प्रवेश कर राम का दर्शन करते हुए शबरी ने प्राणों का त्याग किया।  

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इस तरह शबरी राम के प्रति प्रेम, भक्ति और सेवा भाव का पर्याय बन गई। उसने साबित कर दिया भगवान केवल भाव और कर्तव्य देखते हैं। जन्म, कुल, वैभव आदि कुछ भी बाह्य उपादान उन्हें आकर्षित नहीं करता।

क्या शबरी ने जूठे बेर भगवान को भोग लगाया?  

अब हम पुनः अपने उसी प्रश्न पर आते हैं। क्या शबरी इतनी नादान थी जो भगवान को जूठे फलों का भोग लगाती। शबरी का लगभग सारा जीवन मतंग जैसे ऋषियों के सानिध्य गुजरा। उनके आश्रम में हमेशा ऋषि-मुनि आते रहते थे और धर्म चर्चा होती रहती थी। यह क्रम मतंग ऋषि के नहीं रहने पर भी जारी रहा। भगवत चर्चा सुन कर और आश्रम के क्रिया कलापों को देख कर इतने दिनों में शबरी को धर्म और भगवान के विषय में इतना ज्ञान हो गया था जितना किसी अन्य वनवासी मुनि को होता है। तभी तो वाल्मीकि जी लिखते हैं कि उसने “विधिवत” राम-लक्ष्मण की पूजा की। इसमें कहीं भी जूठे बैर खिलाने का वर्णन नहीं है। भगवान से उसके वार्तालाप में कहीं भी नहीं लगता है कि वह ऐसी निपट गँवार थी।

रामायण के अन्य पात्रों की तरह शबरी का सबसे प्राचीन वर्णन वाल्मीकि रामायण में ही है। बाद में संभवतः भक्ति को अधिक महत्व देने के लिए और शबरी की कथा को थोड़ा और भावप्रवण बनाने के लिए उसमें ऐसी बातें जोड़ी जाने लगी। शबरी से संबंधित कई किस्से-कहानियाँ बाद के कई ग्रंथों में लिखे गए। जैसे; लक्ष्मण द्वारा जूठे बेर नहीं खाना और उसी बेर से संजीवनी बूटी बनना जिससे बाद में उनकी जान बचाई जा सकी, आदि।

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