वाल्मीकि रामायण और बौद्ध धर्म में क्या संबंध है?-भाग 67

Share

इतिहासकारों के अनुसार छठी शताब्दी ईसा पूर्व में भगवान बुद्ध का जन्म हुआ था। बुद्ध भगवान राम के बड़े पुत्र कुश के वंश में ही उनके 46वीं पीढ़ी में हुए थे। इसलिए उन्हें भी राम का वंशज माना जा सकता है। उनके द्वारा स्थापित बौद्ध धर्म लोकप्रियता में न केवल अपने समकालीन जैन, आजीवक आदि धर्मों से बहुत आगे निकल गया बल्कि परम्परागत सनातन धर्म को भी चुनौती देने लगा। इसकी लोकप्रियता भारत से बाहर भी फैली। लगभग प्रथम शताब्दी ईस्वी पूर्व में यह हीनयान और महायान में बंट गया। लेकिन फिर भी इसकी लोकप्रियता कम नहीं हुई। अशोक जैसे बड़े राजा जो पहले शैव थे, वे बाद में बौद्ध बन गए।

वैदिक धर्म और बौद्ध धर्म में प्रतिद्वंद्विता

धीरे-धीरे वैदिक और बौद्ध धर्म के अनुयायी आपस में प्रतिद्वंद्विता करने लगे। पर भारत का संस्कार कुछ ऐसा है कि यहाँ कैथोलिक-प्रोटेस्टेंट या शिया-सुन्नी की तरह कभी तलवार से श्रेष्ठता स्थापित करने का प्रयास नहीं किया गया। बल्कि शास्त्रार्थ (यानि सभाओं में नियमानुसार शास्त्रों पर वाद-विवाद) और शास्त्र इसके माध्यम बने। यहाँ तक कि ये शास्त्रार्थ कभी-कभी इतने कटु हो जाने लगे कि हारने वाले को जीतने वाले का धर्म और शिष्यत्व, और कभी-कभी मृत्यु तक, स्वीकार करना पड़ता था।

इस तरह शास्त्र ने कई बार शस्त्र का भी काम किया। साथ ही ये सामंजस्य के भी सारथी बने। इस समय भारत पर कई विदेशी आक्रमण भी हुए, जैसे शक, कुषाण, हूण आदि के आक्रमण। जनसंख्या बढ़ने के कारण समाज में आंतरिक समायोजन भी हो रहा था। इन विभिन्न घटकों में सामंजस्य बनाए रखने के लिए भी शास्त्रों में बहुत परिवर्तन हुआ। 

Read Also  कृष्ण-बलराम ने प्रलंबासुर का वध क्यों और कैसे किया? - part 19

प्राचीन पुस्तकों में संशोधन

ऐसी ही संक्रमण के काल में अपने-अपने धर्म को ऊँचा और दूसरे को नीचा दिखाने के लिए प्राचीन पुस्तकों में कई संशोधन हुए। सामाजिक सामंजस्य को बनाए रखने के लिए भी ऐसे परिवर्तन किए गए। ईस्वी सन पहली-दूसरी शताब्दी में यद्यपि देश में कोई बहुत बड़ा साम्राज्य नहीं था। लेकिन सामाजिक स्तर पर ये प्रक्रियाएँ हो रही थीं। भारशिव और नाग आदि वंश के राजा इस प्रक्रिया को बढ़ावा दे रहे थे। गुप्तकाल तक यह प्रक्रिया चलती रही।

वास्तव में वर्तमान हिंदू धर्म का वास्तविक स्वरूप इसी समय प्रकट हुआ। लक्ष्मी, दुर्गा, काली, हनुमान जैसे देवता, जिनका वैदिक ग्रंथों में कोई उल्लेख नहीं था, या बहुत ही कम उल्लेख था, इस समय प्रमुखता पाने लगे।

समस्त पुराण और स्मृति साहित्य इसी समय लिखे गए। वाल्मीकि कृत आदि-महाकाव्य रामायण में भी इसी दौरान संभवतः कई संशोधन किए गए। इसीलिए रामायण में कुछ ऐसे संदर्भ मिलते हैं जो बौद्ध मत का खंडन करते हैं। ऐसे तीन उदाहरण का यहाँ उल्लेख करना आवश्यक है।

1. उत्तर काण्ड में कुत्ते का रामजी द्वारा न्याय करने का प्रसंग है। इसमें मठाधीश होने को बहुत बुरा बताया गया है। कालक्रम में बुद्ध राम के बहुत बाद हुए थे। बौद्ध और जैन जैसे धर्म संस्थागत धर्म थे। इनमें मठों की परंपरा थी। लेकिन सनातन धर्म में ऐसी कोई परंपरा नहीं थी। राम के समय आश्रम होते थे। इन आश्रमों की राम ने स्वयं बहुत प्रशंसा की थी। स्पष्टतः बाद में बौद्धों का मजाक उड़ाने के लिए यह कथा उसमें समाविष्ट किया गया होगा।

Read Also  राम का लंका के विरुद्ध युद्ध के लिए प्रयाण-भाग 43

2. पंचवटी जाते समय रास्ते में राम-सीता संवाद। राम ने दंडकारण्य के ऋषियों को राक्षसों को मारने का वचन दे दिया। लेकिन सीता इस बात से सहमत नहीं थीं कि राम हिंसा करें। उन्होंने अहिंसा का प्रतिपादन किया। लेकिन अहिंसा का खंडन कर राम धर्म संगत होने पर हिंसा को उचित बताते हैं। उनके अनुसार राक्षस दूसरों को पीड़ित करते थे। इसलिए उनका वध करना पाप नहीं था। पर, वे भी अकारण किसी राक्षस की भी हत्या नहीं करना चाहते थे।     

3. चित्रकूट में जब भरत राम को मना कर वापस अयोध्या ले जाने के लिए आते हैं तब उसी प्रसंग में एक नास्तिक मत के ऋषि जाबालि का उल्लेख है। वे नास्तिक मत के आधार पर राम से वापस लौटने के लिए तर्क देते हैं। उनके इस विचार से राम अत्यंत क्रुद्ध हो जाते है। यहाँ तक कि वे पूछते हैं ऐसे व्यक्ति को अयोध्या की सभा में स्थान कैसे दिया गया था।

उपर्युक्त तीन उदाहरण राम की कथा के मूल भाग नहीं हैं। बल्कि किसी न किसी तरह से बातचीत में उन्हें स्थान देकर राम के मुख से बौद्ध मत का खंडन कराया गया है।

     ऐसे प्रसंग भी यह साबित करतें हैं कि आज रामायण जिस रूप में हमारे समक्ष है, वह उसका मूल रूप नहीं है। बल्कि कुछ विशेष उद्देश्यों की पूर्ति के लिए उसमें बाद में शामिल किया गया है। इससे सीता की अग्नि परीक्षा, उनका निर्वासन, शंबूक का वध जैसे कई प्रसंगों के बाद में जोड़े जाने के तर्क को भी बल मिलता है।

1 thought on “वाल्मीकि रामायण और बौद्ध धर्म में क्या संबंध है?-भाग 67”

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top