आज तीसरा दिन है मेरे और कौस्तुभ में झगड़ा हुए। दो दिन तक तो मैने खाना भी नहीं खाया। मैं खाई या भूखी हूं, ये देखने वाला भी कोई नहीं है। बीमार हूं, रो रही हूं, गुस्सा में हूं या खुश हूं, कोई नहीं है घर में इसकी परवाह करने वाला। इसलिए आज तीसरे दिन जब भूख बर्दास्त नहीं हुआ तो खुद ही खाना खा ली। मुझे उम्मीद थी कौस्तुभ आएंगे और मुझ से बातें करेंगे। भले ही माफी नहीं मांगेंगे लेकिन कुछ तो बात करेंगे। लेकिन नहीं। आज भी वह आए, नशे में धुत, सुक्खू काका ने खाना दिया, खाया और अपने कमरे में जाकर सो गए।
मेरे मन में कांच का एक टुकड़ा सा चुभा। पर इसमें सारा दोष कौस्तुभ का ही नहीं है। अपनी किस्मत को भी दोष नहीं दे सकती। किस्मत ने तो मुझे सबकुछ दिया था, पर मैं ही अपनी बेवकूफी से उन सबको खो दी। आज सच में मुझे कमल की बहुत याद आ रही है। और टुकी की भी। आज मैं महसूस कर रही हूँ टुकी कितनी मजबूत है।
कमल और मैं साथ में स्कूल और कॉलेज में पढ़े थे। वैसे मुझे पढ़ने का कोई शौक था नहीं। पापा के कहने पर पढ़ रही थी। पढ़ती भी इतनी ही थी कि पास हो जाऊं। क्लास बंक कर बाहर घूमना, दोस्तों के साथ गप्पे मारना मेरा स्कूल कॉलेज में प्रिय काम होता था। कॉलेज में एक और काम हो गया था, नए नए स्टाइल के ड्रेस पहन कर अपने दोस्तों से तारीफे लेना। स्कूल में ड्रेस कोड होने के कारण यह ज्यादा नहीं कर पाती थी।
कमल मेरे से बिल्कुल अलग था। वह उत्तर प्रदेश के किसी छोटे शहर से पढ़ने दिल्ली आया था। उसका लक्ष्य पढ़ लिख कर इस लायक बनना था कि अपने परिवार की सहायता कर सके। वह चाहता था कि उसके भाई बहन भी पढ़ कर अच्छे पदों पर जाएं। शुरू में तो वह किसी रिश्तेदार के यहां रहता था लेकिन बाद में अलग कमरा लेकर रहने लगा।
कमल के विपरीत मुझे करियर की ज्यादा चिंता नहीं थी। क्योंकि मेरे पापा एक बड़े बिल्डर थे। मैं उनकी इकलौती संतान थी। मेरे बोलने की देर होती थी, कोई चीज मिलने में देर नहीं लगती। पापा की कोठी और बैंक बैलेंस मेरा ही तो था। अच्छे पढ़े लिखे और प्रोफेशनल डिग्री से समाज में इज्जत मिलती है। इसलिए पापा ने डोनेशन देकर मेरा एडमिशन बीडीएस कॉलेज में करवा दिया। हालांकि दांतो का डॉक्टर बनने में मेरी कोई बहुत रुचि नहीं थी पर डिग्री ले ली क्योंकि पापा ऐसा चाहते थे।
कमल, वह मुझे चाहता था। मेरा भोला चेहरा उसे पसंद था। मेरा अल्हड़पन उसे पसंद था। और मुझे…. मुझे उसका मुझे पसंद करना पसंद था। उसकी गंभीरता मुझे पसंद थी जिससे वह मेरे बचपना को झेलता था। जब उसने मुझे शादी के लिए प्रपोज किया तो जैसे मैं तो इस क्षण का इंतजार ही कर रही थी। पापा भी इस रिश्ते के लिए मान गए। लेकिन उन्होंने कमल को चेतावनी दे दी कि यह मेरी इकलौती संतान है और मुझे जान से भी प्यारी है, इसे कोई तकलीफ नही होनी चाहिए। जल्दी ही हमारी शादी हो गई।
मेरा बीडीएस और उसका इंजीनियरिंग का फाइनल एक वर्ष में ही हुआ था। मैने यूं ही मन लगाने के लिए एक प्राइवेट हॉस्पिटल में दांतो के डॉक्टर के रूप में काम करना शुरू किया। पर इस काम में मेरा मन नहीं लगा। कमल को बहुत अच्छी नौकरी नहीं मिली थी अभी। मेरे पापा ने एक गाड़ी और एक फ्लैट मुझे गिफ्ट किया था। शादी के बाद हम लोग उसी में शिफ्ट हो गए।
कमल ने मेरे पापा को दिए गए वचन को निभाया। वह मुझे कभी कोई तकलीफ नही होने देता था। कुक सुबह आठ बजे आती थी l पर कमल को साढ़े सात बजे ही निकलना होता था क्योंकि उनका ऑफिस दूर था। मैं कभी उसे ब्रेकफास्ट या लंच बना कर नहीं दी क्योंकि मुझे खाना बनाने नहीं आता था। मां कहती थी कि खाना बनाना सीख लो लेकिन पापा कहते थे पैसे हों तो काम करने वालो की कमी नहीं होती। मेरी बेटी गर्मी में रसोई में जाकर खाना बनाएगी! कमल हमेशा ऑफिस के कैंटीन में ही ब्रेकफास्ट और लंच करते। रात को हम दोनों ज्यादातर बाहर ही खाते। मुझे घर का कोई काम नही आता था। लेकिन उन्होंने मुझे कभी कुछ नहीं कह। उस समय भी नहीं जब उनके मां पापा हम से मिलने हमारे घर आए, उनके सामने दो दिन तो मैने सलवार कमीज पहन लिया लेकिन इसके बाद फिर अपने ‘आरामदायक’ कपड़ों में आ गई।
सब कुछ अच्छा चल रहा था। एक दिन कमल ने मुझ से कहा कि उनका भाई अब प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी करने लगा था, वह चाहता था कि वह दिल्ली में हमारे साथ ही रहे और कोचिंग क्लास ले। मैने हामी भर दी। लेकिन जब उसका भाई हमारे साथ रहने लगा तो कुछ दिन बाद मुझे उसकी उपस्थिति खलने लगी। मुझे लगने लगा मेरे हिस्से का प्यार और पैसा दोनों कमल भाई के साथ बांटने लगा है। इकलौती संतान थी अपने घर पर में। कोई हिस्सेदार नही। मैं अब चाहती थी कि कमल भाई को भी वैसे ही कमरा लेकर रख दें जैसे वह विद्यार्थी जीवन में रखता था। लेकिन कमल का कहना था सगे भाई का घर होते हुए वह अलग कमरा लेकर रहे यह अच्छा नही लगता। धीरे-धीरे इस बात पर कमल से मेरी बहस होने लगी।
एक दिन बहस कुछ ज्यादा हो गई। मैं भी गुस्से में बहुत कुछ कह गई। मैं जब कमल के माता पिता के लिए अपशब्द बोली तो उसे बर्दास्त नही हुआ। उसने मुझे एक थप्पड़ मार दिया।
मैं सीधे पापा को फोन लगा कर रो रो कर सब बता दी। पापा गुस्से में भरे हुए मेरे घर आए और मुझे साथ ले गए। उन्होंने कमल को भी बहुत बुरा भला कहा। लेकिन कमल ने उन्हें जवाब नहीं दिया। पर इस घटना के बाद कमल से मेरा रिश्ता सामान्य नहीं बन पाया। मेरे पापा रोज फोन कर हालचाल पूछते। कमल का अपने परिवार वालों से नजदीकी मुझे ज्यादा अच्छी नहीं लगती। एक दिन मैंने निर्णय कर लिया कि अब मुझे उसके साथ नहीं रहना है। पापा ने एक बार फिर मेरा साथ दिया। उन्होंने कमल से साफ कह दिया कि उनके बेटी के लिए लड़कों की कमी नहीं है।
पर मेरी मां इस सबसे खुश नहीं थी। उसका मानना था कमल अच्छा लड़का था और मुझे प्यार भी करता था। जब दो लोग साथ रहते हैं तब थोड़ी बहुत बात ऐसी होती है जो पसंद नहीं होते हुए भी स्वीकार करना होता है। टुकी भी वहीं थी। उसने भी माँ का समर्थन किया।
टुकी मेरे पापा के यहाँ खाना बनाने और अन्य घरेलू काम करती थी। उसका पति मजदूरी करता था। वह अपनी कमाई शराब पीने में खर्च कर देता था। कभी-कभी तो वह टुकी के पैसे भी ले लेता था और रोकने पर मारता भी था। टुकी पढ़ी-लिखी नहीं थी। लेकिन उसे अपने बच्चों को पढ़ाने का बहुत चाव था। उसके दो बच्चे थे- एक बेटा और एक बेटी। दोनों को वह अच्छे स्कूल में पढ़ा रही थी। दोनों हॉस्टल में रहते थे ताकि अपने पिता जैसे न बन जाए। इतने अधिक पैसों के लिए उसे अधिक मेहनत करना होता था। वह छह घरों में काम करती थी। उसका घर लगभग 35 किमी दूर एक झोपड़पट्टी में था। वहाँ से वह रोज सुबह पाँच बजे के बस से निकलती थी। सारा दिन काम कर लगभग छह बजे वापसी के लिए निकलती थी। इस समय ट्रैफिक ज्यादा रहता था। बसों में भीड़ भी होती थी। शायद ही कभी कुछ देर के लिए सीट मिलता हो बस में। दिन भर के काम और थकाने वाले बस यात्रा कर वह लगभग आठ बजे घर पहुँचती थी। घर में शराबी पति की गलियाँ और कभी-कभी पिटाई खाती, खाना बनाती और बाकी काम करती थी। फिर सुबह साढ़े चार बजे उठ कर वही दिनचर्या।
अनपढ़-गंवार और पति द्वारा रोज पिटाई और गाली खाने वाली टुकी द्वारा सलाह देना मुझे बहुत बुरा लगा। माँ ने भी उसके सामने मुझे कमल के पास लौटने के लिए कहा। कमल के सामने झुकना मुझे बिल्कुल गंवारा नहीं था। मैं माँ पर चिल्ला उठी ‘अगर मुझे टुकी की तरह ही बनाना था जो पिटाई खा कर भी पति के पाँव में पड़ी रहे तो पढ़ाया लिखाया क्यों। ……. इसी दिन के लिए मुझे पाला …. कहते कहते मैं रोने लगी। शोर सुन कर पापा आ गए। पूछने पर माँ ने बताया। लेकिन पापा ने उन्हें यह कह कर चुप करा दिया कि जो लड़का शादी के छह महीने बाद ही हाथ उठाने लगे उसका क्या भरोसा। उसकी हिम्मत बढ़ती जाएगी। मुझे भी पापा की बात सही लगी।
कमल से मैंने कोर्ट में तलाक ले लिया। इस समय मेरी उम्र 23 साल थी। मैं शायद दुनियादारी से अनजान थी। मेरी दुनिया मेरे घर, मां पापा और दोस्तों तक ही थी। इसी बीच मेरी मां को कैंसर होने का पता चला। बहुत इलाज हुआ लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका। अभी तक जो मुझे सही गलत बताती थी अब वह मां भी नहीं रही। टुकी अभी भी मेरे घर में काम करती थी। पर वह मेरे लिए नौकर मात्र थी। हाँ कभी-कभी उस पर मुझे तरस जरूर आ जाता था। मेरी नजर में उसकी हैसियत इतनी थी ही नहीं कि वह मुझे कुछ समझा सके या सलाह दे सके।
27 साल की उम्र में मेरी दूसरी शादी साकेत ही हुआ। वह पापा के किसी दोस्त का बेटा था। उसका अपना व्यवसाय था। पैसों की कमी नहीं थी। परिवार अच्छा था। पर साकेत को शराब पीने की लत थी। पीने के बाद उसे कुछ खबर नहीं होती कि वह क्या करता था। रात को पी कर आना और मेरे मना करने पर झगड़ा यह रोज का काम हो गाया।
इसी बीच मेरे पापा के बनाए एक बिल्डिंग के गिरने से एक आदमी की मौत हो गई और तीन लोग घायल हो गए। इस केस से पापा के बिजनेस को बहुत आघात पहुंचा। वे मानसिक रूप से भी परेशान रहने लगे। मां के इलाज और इस केस दोनों के कारण उनकी आर्थिक स्थिति पर भी बुरा प्रभाव पड़ा। उनकी परेशानी देख कर अब मैं उन्हें सब कुछ नहीं बताया करती थी।
इधर साकेत की हालत दिन से दिन खराब होती जा रही थी। अब वह मुझ पर हाथ भी उठाने लगे थे। पर जब होश में आते तब माफी मांगते। अगर कभी ज्यादा बीमार होती तब वह मेरा बहुत ख्याल रखते थे। इसी बीच मैं एक प्यारे से बेटे की मां बन गई। गर्भ के दौरान और प्रसव के बाद भी उन्होंने बहुत ख्याल रखा था मेरा। पर उनके शराब पीने के लत के कारण मेरा झगड़ा उससे बढ़ता गया। एक दिन मैं उनका घर छोड़ कर पापा के घर आ गई।
साकेत मनाने आया लेकिन मैं नहीं मानी। मेरी नजर में पहले गाली देना, मारना, और फिर मनाने आना इस पर अगर चली जाती तो यह मेरे आत्मसम्मान के खिलाफ होता।
हमने सहमति से तलाक के लिए कोर्ट में केस फाइल किया। टुकी ने फिर मुझे समझाना चाहा। अब तक टुकी ने अपनी कमाई से अपना एक छोटा सा घर ले लिया था। अब उसे घर का किराया नहीं देना पड़ता था। उसके दोनों बच्चे कॉलेज में चले गए थे। पति एक बार बस से उतरते समय बस से गिर गया। उसके पैर की हड्डी तीन जगह से टूट गई। इस समय टुकी ने उसकी जी जान से सेवा किया। कई दिन उसे काम से छुट्टी भी लेनी पड़ी। मुझे उसका यह प्यार समझ नहीं आता था। जिस पति ने उसे तकलीफ के सिवाय कुछ नहीं दिया उसके लिए इतनी ममता! मैं उसे कई बार पहले समझा चुकी थी ऐसे पियक्कड़ पति को छोड़ और दूसरी शादी कर ले। अभी तुम्हारी उम्र है, मिल जाएगा। लेकिन वह मेरी बातों को हमेशा हँस कर टाल देती थी जैसे कि मैंने कोई चुटकुला कहा हो। मुझे उसका हँसना चुभ जाता था। एक गँवार औरत मेरी बातों को मज़ाक में उड़ा दे यह मेरे आत्मसम्मान को ठेस था। फिर मैंने उससे इस बारे में बात करना भी छोड़ दिया था। मैं उससे उसके घर परिवार के बारे में कुछ नहीं पूछती थी। जब उसने छुट्टी ली तब पता चला उसके पति के एक्सीडेंट के बारे में। कई बार तो मेरा मन करता उसे नौकरी से निकाल दूँ। लेकिन पापा समझाते वह अच्छा काम करती है, और फिर आज कल अच्छी कामवाली मिलना मुश्किल हो गया है, इसलिए मैं चुप रह जाती थी।
पापा के घर में बैठे मेरा मन नहीं लगता था। सभी दोस्त अपने अपने परिवार और करियर में लग गए थे। जो दिल्ली में थे उनसे भी मिलना बहुत कम होता था। कुछ दोस्तों से फोन पर कभी कभी बातें हो जाती थी बस। बेटा अब तीन साल का हो चुका था। टुकी उसका ख्याल अच्छे से रख रह थी। इसलिए अब मैं फिर से डेंटिस्ट का प्रैक्टिस करने की सोची। एक प्राइवेट क्लिनिक ज्वाइन भी की लेकिन इस काम में तो शुरू से ही मेरा मन नहीं लगा।
32 साल एक अजीब उम्र होती है। कुछ शुरू करने के लिए लगता है देर हो गई। कुछ छोड़ना चाहो तो लगता है अभी जल्दी है। इस उम्र में प्रैक्टिस फिर से शुरू करना अब मुश्किल लग रहा था। पापा के घर में अभी तक जिस शान शौकत और मनचाहे तरीके से रहती आई थी उसे छोड़ने के प्रयास की अभी कोई जल्दी नहीं थी। सोने, टीवी देखने, फोन पर बातें करने और अपने प्यारे कुत्ते ब्राउनी के साथ खेलने में समय निकल ही जाता था। कुछ देर अपने बेटे के साथ भी खेल लेती थी।
एक दिन सुबह जब टुकी चाय देने पापा के कमरे में गई तब उनके बिस्तर पर पापा नहीं उनका शरीर मात्र था। डॉक्टर ने कहा ब्रेन स्ट्रोक से उनकी मृत्यु हुई थी।
कोर्ट ने हमारा तलाक मंजूर कर लिया। तलाक के लिए मैंने साकेत से एक मोटी रकम ली। मुझे इसकी जरूरत नहीं थी लेकिन मैं उसे सबक सिखाना चाहती थी।
साकेत से अलग होने के पास पैसे तो थे मेरे पास अभी। पापा का घर भी था। लेकिन अब मैं बिल्कुल अकेली हो गई थी। टुकी घर और मेरे बेटे की देखभाल अच्छे से करती थी। लेकिन मुझे लगने लगा कि मैं बिल्कुल अकेली हो गई हूँ इस दुनिया में। पापा रहे नहीं। किसी रिश्तेदार से बहुत अच्छे रिश्ते थे नहीं। सभी दोस्त अपनी दुनिया में व्यस्त थे। बेटा अब बातों को समझने लगा था। मेरी उम्र पैंतीस पार हो चुकी थी। बालों पर सफेदी को आर्टिफ़िश्यल कलर से छुपाने लगी और एंटी रिंकल क्रीम लगाने लगी। कभी सोचती घर का एक हिस्सा किराया पर लगा दूँ, कोई साथ तो मिल जाएगा। इसी बीच टुकी की बेटी को कहीं नौकरी मिल गई। वह अपनी माँ को साथ ले गई। अब उसे काम करने की जरूरत नहीं थी। दूसरी कई काम वाली आई लेकिन टुकी जैसी अपने घर की तरह कोई काम नहीं करती थी। फिर भी कोई और उपाय नहीं देख कर जैसी मिली उसी को रखी रही।
अब मुझ में वह पहले वाली अल्हड़पन नहीं रहा। माता पिता का समर्थन छूटने के बाद मुझे दुनियादारी की समझ आ गई थी। मेरी एक दोस्त ने कौस्तुभ के लिए बताया। शादी के साल भर के अंदर ही इनका तलाक हो गया था। मैंने भी सोचा अकेलापन बांटने के लिए कोई साथी तो मिल जाएगा। कुछ मुलाकातों के बाद ही मैंने कौस्तुभ से शादी कर लिया। उन्होने मेरे बेटे को भी अपना लिया। लगा अब सब कुछ ठीक हो जाएगा। लेकिन नहीं। कौस्तुभ बहुत ही नीरस और स्वार्थी व्यक्ति थे। उन्हें गुस्सा भी बहुत जल्दी आ जाता था। मेरी भावनाओं की उन्हें कोई परवाह नहीं थी।
लेकिन मैं अब जीवन में स्थायित्व चाहती थी। वास्तव में खुशियों के पीछे भागते-भागते मैं थक गई थी।
अतीत को याद करते करते न जाने कब मुझे नींद आ गई। सुबह उठी तो देख कौस्तुभ ऑफिस चले गए थे। सुक्खु काका ने बताया कि वह आज जल्दी ऑफिस चले गए थे। मैं सोची शायद मुझ से पहले बात करने से उनका पौरुष का अभिमान आहत होता हो, इसलिए मैं ही फोन कर लेती हूँ। मैंने कॉल दिया। मोबाइल की घंटी बज रही थी लेकिन फोन नहीं उठा। कुछ देर बाद दुबारा कोशिश की। तीसरे कोशिश में उन्होने फोन उठाया और इतना ही कहा- “अभी कुछ जरूरी काम कर रहा हूँ, बाद में बात करता हूँ।” यह कह कर फोन रख दिया। दिन भर मैं मोबाइल हाथ में लिए रही। लेकिन उनका कॉल नहीं आया। अब मेरा अभिमान बहुत आहत हो चुका था। गुस्से में मैं उनके ऑफिस जाने के लिए निकल गई।
लाल बत्ती पर जब मेरी गाड़ी रुकी तब अचानक मेरी नजर एक दुकान के बाहर खड़ी महिला पर पड़ी। शक्ल जानी पहचानी लगी। हाँ यह वही है टुकी। मैं उस दुकान के पास जाकर अपनी गाड़ी रोकी। उसने भी मुझे देखा। बहुत खुशी और उत्साह से वह मेरे पास आई। ‘दीदी आप!’ आइए न। आइए ये मेरी दुकान है।’ दुकान में उसने मुझे बैठने के लिए स्टूल दिया। इच्छा न होने पर भी प्रेम से मंगाया गयी उसकी चाय मुझे पीनी पड़ी। बातों बातों में पता चला उसकी बेटी वकील बन गयी थी। दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रवेश परीक्षा में उसे अधिक नंबर आए थे। इसलिए हॉस्टल और पढ़ाई के भी कम पैसे लगे। बेटा छोटा था। उसने चार्टरड अकाउंटेंट की पढ़ाई की। दोनों भाई बहन कमाते थे। वे चाहते थे कि माँ अब आराम करे लेकिन टुकी को खाली बैठना अच्छा नहीं लग रहा था। फिर उम्र भी तो इतनी नहीं हुई थी। वह यह भी नहीं चाहती थी कि बच्चों के शादी ब्याह के बाद उनके जीवन में दखल दे। इसलिए वह कोई काम करना चाहती थी। बच्चों ने शॉल बनाने वाला एक मशीन ला दिया था। एक छोटा सा दुकान लेकर वह यह शॉल बना कर बेचती थी। पास में ही उनका फ्लैट था। ननद के पति की मौत के बाद वह भी उसके साथ ही रहती थी। वह दुकान में भी टुकी का साथ दे देती थी। लीवर खराब होने के कारण टुकी के पति की मौत कई साल पहले हो चुकी थी। अंतिम समय में उसे अपनी पत्नी पर गर्व रहा जो एक मजदूर के बच्चों को इतनी ‘बड़ी-बड़ी पढ़ाई’ करवा रही थी।
टुकी की दुकान से निकलने के बाद मैं अपने को हल्का महसूस कर रही थी। महिला सशक्तिकरण, स्वतन्त्रता, आत्म सम्मान, स्वाभिमान आदि की जो मेरी परिभाषाएँ थी वह ध्वस्त होने लगी। टुकी ठीक ही तो कहती थी, “पति की गाली और पिटाई सहना अच्छी बात नहीं है दीदी लेकिन सम्बन्धों को खतम भी तो नहीं किया जा सकता है। मैं इतनी स्वार्थी कैसे हो जाऊ कि बच्चों को पिता के नाम से वंचित कर दूँ। पति भले ही मेरी परवाह नहीं करता हो, उसका परिवार मुझे कोई सुख नहीं देता हो लेकिन वह भी तो अब मेरा परिवार ही है न। उसे संभालना भी तो मेरा काम है। फिर मर्द बदलने से खुशियाँ मिल ही जाएगी इसकी भी कोई गारंटी तो नहीं है। तो क्यों न खुशियाँ मैं अपने कामों में ही ढूँढूँ।” पढ़ाई को उसकी आठवीं में ही छूट गई थी लेकिन फिर भी थोड़ी बहुत अँग्रेजी और हिन्दी सीख ली थी उसने दिल्ली आकर। अच्छी हिन्दी बोल लेती थी वह। हस्ताक्षर अँग्रेजी में करती थी। उसने कभी सीखना और मेहनत करना नहीं छोड़ा भले ही जिंदगी में कितनी ही मुश्किलें आयीं।
लेकिन मैं। मैंने क्या किया। अच्छे स्कूल कॉलेज से बड़ी डिग्रियाँ ली। पर खुशियों के लिए दूसरों पर ही निर्भर रही। परिवार के महत्त्व को कभी समझ नहीं सकी। कमल का परिवार क्या मेरा परिवार नहीं था। ये बातें मैं समझ नहीं सकी। पापा ने भी मुझे यह कभी नहीं समझाया। मैं हमेशा अपने लिए सोची। लोग मेरी भावनाओं को समझें, मेरी जरूरतों को समझे पर मैं कभी किसी को भावनाओं को समझने की कोशिश नहीं की। मैंने किसी को खुश देने की कोशिश नहीं की।
यही सब सोचते हुए मैं घर लौट आई। शाम को जब कौस्तुभ आए मैं मुसकुराते हुए उनका स्वागत की। सुक्खु काका के बदले उस दिन मैं चाय लेकर गई उनके लिए। उन्होने आश्चर्य से मेरी तरफ देखा पर कुछ बोले नहीं। चाय पीते हुए मोबाइल देखने लगे। मैं फ्रिज खोल कर उसमें रखे समान को देखी। फिर यूट्यूब से रिसीपी बनाना सीखने लगी। बेटे के लिए सुबह ब्रेकफ़ास्ट और लंच भी तो बनाना था। कौस्तुभ और सुक्खु काका अविश्वास से मेरी तरफ देख रहे थे। डिनर बनाते समय जाने क्यों फिर मुझे कमल की याद आ गई। आज इच्छा हो रही थी अपने हाथ का बना कुछ खिलाऊँ उन्हें। उनकी परेशानियाँ सुनू और अपने कंधे पर उनका सर रख कर कहूँ कोई बात नहीं हम दोनों हैं न कोई चिंता की बात नहीं। सामने देखा तो कौस्तुभ खड़े थे।
