श्रीकृष्ण का गाय चरा कर वापस लौटना
दिनभर वन में रहने के बाद शाम को जब श्रीकृष्ण वापस लौटते तो उस समय ब्रज में उत्सव की तरह आनंद और उत्साह का माहौल रहता था। उनके बांसुरी की ध्वनि सुनकर सभी गोपियाँ अपने घरों से बाहर आ जाती थीं। गायों को लेकर लौटते हुए श्रीकृष्ण के सुंदर सूरत को देखने के बाद ही वे कोई और काम करती थीं।
अरिष्टासुर का ब्रज आगमन
एक दिन श्रीकृष्ण शाम को जब ब्रज में इस तरह प्रवेश कर रहें थे, उसी समय अरिष्टासुर नामक दैत्य एक बैल का रूप धारण करके आ गया।
वह मजबूत डीलडौल वाला बैल बड़े ज़ोर से अपने खुरों को पटक रहा था और गर्जन कर रहा था। वह अपने पैरों से धूल उड़ाता जा रहा था, सिंगो से चहारदीवारी, खेतों के मेड़ आदि तोड़ता जा रहा था। उस तीखे सिंग वाले भयंकर बैल को देख कर गोप और गोपियाँ सभी भयभीत हो गए। पशु अपने रहने का स्थान छोड़ कर भाग गए।
सभी ब्रजवासी कृष्ण की पुकार करते हुए उनकी शरण में गए। श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को ढांढस बढ़ाया और अरिष्टासुर (जो बैल रूप होने के कारण वृषासुर भी कहलाया) को ललकारा।
अरिष्टासुर को क्रोधित करने के लिए श्रीकृष्ण अपने एक सखा के गले में हाथ डाल कर खड़े हो गए। क्रोधित होकर वह दैत्य अपने खुरों से धरती को खोदता हुआ अपने तीखे सिंग आगे कर श्रीकृष्ण की ओर झपटा।
श्रीकृष्ण द्वारा अरिष्टासुर का वध
श्रीकृष्ण ने उसके सींगों को पकड़ लिया और उसे पीछे की ओर धक्का दिया। वह दैत्य अठारह कदम पीछे जाकर गिर गया। लेकिन फिर से उठ कर उनपर झपटा। भगवान ने इस बार भी उसे सिंग से पकड़ लिया और पैरों से ठोकर मार कर उसे जमीन पर गिरा दिया। फिर पैरों से दबा कर उसका कचूमर निकाल दिया। उसी का सिंग उखाड़ कर उस पर प्रहार किया जिसके बाद वह उठ नहीं सका और उसकी मृत्यु हो गई।
देवताओं ने फूल बरसा कर उनकी स्तुति की। सभी गोप उनकी प्रशंसा करने लगे। तत्पश्चात श्रीकृष्णजी ने बलरामजी और अन्य सखाओं के साथ गोष्ठ (गायों के रहने का स्थान) में प्रवेश किया।

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