श्रवण कुमार की हत्या दशरथ जी ने क्यों की थी?

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श्रवण कुमार की हत्या

राम के पिता राजा दशरथ जब राजकुमार थे, उनका विवाह भी नहीं हुआ था, उसी समय उन्होंने श्रवण कुमार को मार डाला था। श्रवण कुमार एक निर्दोष मुनि पुत्र था, जो अपने माता-पिता के लिए जल लेने नदी के किनारे आया हुआ था। लेकिन यह उन्होंने जानबूझ कर नहीं किया अपितु उनके लापरवाही से ऐसा भयंकर अपराध हो गया था। उनका तीर लगा तो केवल श्रवण कुमार को, लेकिन मृत्यु उसके माता-पिता की भी हुई। इस तरह दशरथ के एक लापरवाही के कारण तीन जानें गईं। पश्चाताप और अपराधबोध से ये जानें वापस नहीं आ सकती थी। इसलिए उन्हें इसका कर्मफल भी मिला।  

हत्या का कारण

हुआ यह था कि दशरथ जी ने शब्दभेदी बाण चलाना सीखा था। इस कला में उन्हें महारत हासिल हो गई थी। वे बिना देखे ही, केवल आवाज सुन कर बिल्कुल सटीक निशाना लगा लेते थे। उनके इस प्रवीणता की सभी प्रशंसा किया करते थे। अपनी प्रशंसा सुन-सुन कर तरुणवय राजकुमार दशरथ में और उत्साह आता था। वे हमेशा ऐसे अवसर की तलाश में रहते थे, जब वे अपने इस कला का प्रदर्शन कर सके।

एक दिन, जब बरसात का मौसम था, वे शिकार खेलने के लिए सरयू नदी के तट पर गए। नदी में जल पीने के लिए आने वाले हिंसक पशुओं को मारने की उनकी योजना थी। रात हो जाने के कारण वे नदी के तट के पास ही रुक गए थे।

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श्रवण कुमार की हत्या

उस रात, सुबह होने से कुछ पहले ही, जब अंधेरा था, उन्होने नदी से कुछ आवाजें सुनी। उस आवाज से दशरथ ने अनुमान किया कि कोई कोई जंगली हाथी अपने सूढ़ में जल भर रहा था। अतः अपने नए सीखे हुए शब्द भेदी बाण चलाने की कला के उत्साह में उन्होने सच्चाई जानने का प्रयास नहीं किया कि वह वास्तव में कोई जानवर ही था। उन्होंने यह मान लिया था कि कोई हाथी या अन्य जंगली जानवर है। अपने शब्द भेदी बाण चलाने की कुशलता के उत्साह में दशरथ ने उस आवाज को लक्ष्य कर के बाण चला दिया।

लेकिन बाण लगते ही किसी मनुष्य के चीखने की आवाज आई। वह दर्द से तड़पते हुए कह रहा था कि उस निर्दोष मुनिकुमार को किसने मारा, अब उसके वृद्ध और अंधे माता-पिता की देखभाल कौन करेगा, इत्यादि।

राजकुमार दशरथ को पश्चाताप

यह आवाज सुन कर दशरथ बहुत घबड़ा गए। उन्होने नदी किनारे जाकर देखा एक नवयुवक मुनि खून से लथपथ पड़ा तड़प रहा था। उसका शरीर पानी से भी भींगा था। उन्होने गलती से यह महान अपराध हो जाने की ग्लानि प्रकट करते हुए उस मुनि से क्षमा माँगते हुए उसे उठाया।

मुनि ने अपना नाम श्रवण कुमार बताया। उसने पास के ही आश्रम में रहने वाले अपने वृद्ध और अंधे माता-पिता के विषय में भी बताया। साथ ही उनके लिए चिंता प्रकट किया।

श्रवण कुमार की मृत्यु

बाण के शरीर में रहने से श्रवण कुमार को बहुत दर्द हो रहा था। इसलिए उन्होने दशरथ से इसे निकाल देने के लिए कहा। दशरथ जानते थे कि तीर निकालते ही मृत्यु हो जाएगी, पर शरीर में तीर रहने से अत्यंत कष्ट हो रहा था। अतः श्रवण कुमार के कहने पर उन्होने तीर निकाल दिया। तीर निकालते ही श्रवण कुमार की मृत्यु हो गई।

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दशरथ का श्रवण कुमार के माता-पिता से मिलना

अत्यंत दुखी होकर दशरथ ने श्रवण कुमार के जल पात्र में स्वयं जल भरा और उनके बताए रास्ते से उनके माता-पिता के पास पहुँचे।

यद्यपि वे शाप के भय से भयभीत भी हो गए थे। फिर भी, चुपचाप भागने के बजाय वे वहाँ पहुँचे और किसी तरह उन्होंने अपने द्वारा गलती से उनके पुत्र की हत्या हो जाने की बात उन्हें बताया।

चूँकि यह अपराध गलती से हुआ था। वे स्वयं पश्चाताप करते हुए आए थे और अपने मुँह से अपना अपराध स्वीकार किया था। इसलिए श्रवण कुमार के माता-पिता ने उन्हें शाप नहीं दिया। उन्होंने पुत्र के शव के पास ले चलने के लिए कहा।

दशरथ को शाप और श्रवण कुमार के माता-पिता की मृत्यु

पुत्र श्रवण कुमार के शव को स्पर्श कर उनके माता-पिता ने उसे जलांजलि दिया। पुत्र के शव का स्पर्श कर उन्हे उस व्यक्ति पर क्रोध हो आया जिसने उनके निर्दोष पुत्र को मारा था। अतः उन्होंने दशरथ को भी पुत्र वियोग में मरने का शाप दे दिया। वे चाहते तो राज्य आदि भी नष्ट कर सकते थे, लेकिन वे पहले ही क्षमा कर चुके थे।

दशरथ उन्हें अपने महल में ले जाकर उनका पूरा ख्याल रखने के लिए भी तैयार हुए। लेकिन वे दोनों नहीं गए और वहीं नदी के किनारे ही अपने प्राणों का त्याग कर दिया।

शाप का प्रभाव

भयंकर अपराध-बोध और पश्चाताप के साथ दशरथ अपनी राजधानी लौट आए। जब उन्हें भी उनके पुत्र राम से वियोग हुआ तब उन्हें फिर अपने इस अपराध की याद आ गई। दशरथ ने माना कि जैसे अनजाने में विष खा लेने पर भी उसका प्रभाव उसी प्रकार होता है जिस प्रकार जानबूझ कर खाने से। इसलिए पाप जानबूझ कर किया गया हो या अनजाने में उसका दुष्परिणाम होता ही है। श्रवण के पिता का शाप अनजाने में हुए उनके पाप के लिए कर्मफल के अनुसार ही था। तदनुसार अपने पुत्र राम के वियोग में दशरथ जी ने भी अपने प्राणों का त्याग किया।

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