शिव तांडव स्तोत्र (हिन्दी अर्थ सहित)

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शिव तांडव स्तोत्र भगवान शिव के सबसे प्रसिद्ध और सबसे प्रभावी स्तोत्र में शामिल है। अपने भक्तिभाव के साथ-साथ यह साहित्यिक दृष्टिकोण से भी बहुत इंपॉर्टेंट है। इसे ताल के साथ बहुत अच्छे से गाया जा सकता है। भगवान शिव का यह बहुत ही प्रिय स्तोत्र है। इसी करण हजारों सालों से आज भी इसकी लोकप्रियता कायम है।

ऐसा कहा जाता है की शिव तांडव स्रोत की रचना लंकापति रावण ने की थी। शिव तांडव स्तोत्र मुख्य रूप से भगवान शिव के ब्रह्मांडीय तांडव नृत्य का वर्णन करता है। इसमें 1008 छंद और  17 श्लोक हैं।

रावण भगवान शिव का बहुत बड़ा भक्त और परम विद्वान था। लेकिन उसमें एक कमी थी जो कि सभी जानते हैं, वह घमंडी बहुत था। जिसका जो स्वभाव रहता है, सबके लिए रहता है। उसने यह घमंड भगवान शिव को भी दिखाया। इस संबंध जो कथा है, अलग अलग किताबों में उसमें थोड़ा बहुत अंतर है।

सबसे प्रसिद्ध कहानी यह है कि वह अपने आराध्य भगवान शिव को कैलाश से लंका लाना चाहता था। इसके लिए वह कैलाश पर्वत के आधार तक पहुंच गया। प्रधान पार्षद नंदी जी ने जब कहा की शिव को बिना उनकी मर्जी के नहीं ले जा सकता है तो वह घमंड से बोला अगर शिवजी नहीं चलेंगे तो मैं उन्हें कैलाश से उठा कर ले जाऊंगा।

ऐसा कहा कर उसने कैलाश पर्वत को जड़ से उखाड़ लिया। पर्वत के हिलने से उसमें रहने वाले प्राणियों को कष्ट होने लगा। लेकिन शिव शांति से बैठे रहे। जब रावण ने पर्वत उठाने के लिए अपना हाथ उसके नीचे रख दिया तब भगवान शिव ने धीरे से अपने बाएँ पैर के अंगूठे से कैलाश पर्वत को दबा दिया दिया। इससे पर्वत का भार इतना अधिक हो गया कि रावण के लिए पर्वत को उठाना तो दूर रहा, उसके लिए अपना हाथ इसके नीचे से निकालना भी मुश्किल हो गया। अब उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। पर उसने धैर्य बनाए रखा। इसी समय उसने जल्दी से यह स्तोत्र बनाकर और गाकर भगवान शिव को सुना दिया। इस स्तोत्र से शिव प्रसन्न हो गए और उसकी गलती को क्षमा कर दिया। रावण का घमंड टूट गया।

इसी कहानी का दूसरा वर्जन यह है कि शिव को लाने के लिए कैलाश पर्वत पर चढ़ते समय रावण ने शिव तांडव स्तोत्र की रचना किया। उसने वीणा बजाते हुए और स्तोत्र गाते हुए ऊपर चढ़ना शुरू किया। उसके गायन और वादन में नटराज शिव इस तरह खो गए कि पार्वती द्वारा याद दिलाने पर भी उन्हें पहले इस बात का ध्यान ही नहीं रहा कि कोई व्यक्ति अनाधिकृत रूप से पवित्र कैलाश पर आ रहा था। पर जब उन्हें इस बात का ध्यान आया तब तक रावण बहुत नजदीक तक पहुँच चुका था।

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रावण कैलाश पर्वत के दक्षिण भाग से ऊपर चढ़ रहा था। भगवान शिव ने रावण को पैरों से हल्का धक्का दे दिया। इससे वह पर्वत से खिसकते हुए नीचे गिरने लगा। उसके कमर में बंधे वाद्य उसके साथ ही घिसटते हुए नीचे आने लगा जिससे कैलाश के दक्षिण भाग में निशान बन गया जो आज भी है।

कथा के अलग अलग वर्जन में अंतर इतने महत्वपूर्ण नहीं हैं। पर सभी कथाएँ इस बात से सहमत हैं कि रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए इस स्तोत्र की रचना की थी और शिव इससे प्रसन्न भी हुए थे।

अब देखते हैं कि इस संस्कृत स्तोत्र में जो श्लोक हैं उसका हिन्दी अर्थ क्या है।

हिन्दी अर्थ– जिन्होंने जटारुपी वन (अटवी) से निकलती हुई गंगा जी के गिरते हुए प्रवाहों से पवित्र किये गए गले में सर्पों की लटकती हुई विशाल माला को धारण कर डमरू के डम डम शब्दों से मण्डित प्रचंड तांडव नृत्य किया, वे शिवजी हमारे कल्याण का विस्तार करें।

हिन्दी अर्थ– जिनका मस्तक जटारुपी कड़ाह में वेग से घूमती हुई गंगा की चंचल तरंगों से सुशोभित हो रहा है, ललाट की अग्नि धक् धक् जल रही है, सिर पर चन्द्रमा विराजमान हैं, उन भगवान शिव में मेरा निरंतर अनुराग हो।

हिन्दी अर्थ– गिरिराज किशोरी पार्वती के शिरोभूषण से समस्त दिशाओं को प्रकाशित होते देख जिनका मन आनंदित हो रहा है। जिनकी निरंतर कृपादृष्टि से कठिन से कठिन आपत्ति का भी निवारण हो जाता है, ऐसे किसी दिगंबर तत्व में मेरा मन आनंद प्राप्त करे।

हिन्दी अर्थ– जिनकी जटाओं में रहने वाले सर्पों के फणों की मणियों का फैलता हुआ प्रभापुंज दिशा रुपी स्त्रियों के मुख पर कुंकुम का लेप कर रहा है। मतवाले हाथी के हिलते हुए चमड़े का वस्त्र धारण करने से स्निग्ध वर्ण हुए उन भूतनाथ में मेरा चित्त अद्भुत आनंद करे।

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हिन्दी अर्थ– जिनकी चरण पादुकाएं इन्द्र आदि देवताओं के प्रणाम करने से उनके मस्तक पर विराजमान फूलों के कुसुम से धूसरित हो रही हैं। नागराज के हार से बंधी हुई जटा वाले वे भगवान चंद्रशेखर मुझे चिरस्थाई संपत्ति देनेवाले हों।

हिन्दी अर्थ– जिन्होंने ललाट वेदी पर प्रज्वलित हुई अग्नि के तेज से कामदेव को नष्ट कर डाला था, जिनको इन्द्र नमस्कार किया करते हैं। चन्द्रमा (सुधाकर) की कला से सुशोभित मुकुट वाला वह उन्नत विशाल ललाट वाला जटिल मस्तक हमें संपत्ति प्रदान करने वाला हो।

हिन्दी अर्थ– जिन्होंने अपने विकराल ललाट पर धक् धक् जलती हुई प्रचंड अग्नि में कामदेव को भस्म कर दिया था। गिरिराज किशोरी के स्तनों पर पत्रभंग रचना करने के एकमात्र कारीगर उन भगवान त्रिलोचन में मेरा मन लगा रहे। 

हिन्दी अर्थ– जिनके कंठ में नवीन मेघमाला से घिरी हुई अमावस्या की आधी रात के समय फैलते हुए अंधकार के समान कालिमा अंकित है। जो गजचर्म लपेटे हुए हैं, वे संसार भार को धारण करने वाले चन्द्रमा के समान मनोहर कांतिवाले भगवान गंगाधर मेरी संपत्ति का विस्तार करें।

हिन्दी अर्थ– जिनका कंठ खिले हुए नील कमल समूह की श्याम प्रभा का अनुकरण करने वाली है तथा जो कामदेव, त्रिपुर, संसार (भव), दक्षयज्ञ, हाथी, अन्धकासुर और यमराज का भी संहार करने वाले हैं, उन्हें मैं भजता हूँ।

हिन्दी अर्थ– जो अभिमान रहित पार्वती जी के कलारूप कदम्ब मंजरी के मकरंद स्रोत की बढ़ती हुई माधुरी के पान करने वाले भँवरे हैं तथा कामदेव, त्रिपुर, भव, दक्षयज्ञ, हाथी, अन्धकासुर और यमराज का भी अंत करनेवाले हैं, उन्हें मैं भजता हूँ।

हिन्दी अर्थ– जिनके मस्तक पर बड़े वेग के साथ घूमते हुए साँपों के फुफकारने से ललाट की भयंकर अग्नि क्रमशः धधकती हुई फैल रही है। धीमे धीमे बजते हुए मृदंग के गंभीर मंगल स्वर के साथ जिनका प्रचंड तांडव हो रहा है, उन भगवान शंकर की जय हो।

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हिन्दी अर्थ– पत्थर और सुन्दर बिछौनों में, सांप और मोतियों की माला में, बहुमूल्य रत्न और मिटटी के ढेले में, मित्र या शत्रु पक्ष में, तिनका या कमल के समान आँखों वाली युवती में, प्रजा और पृथ्वी के राजाओं में समान भाव रखता हुआ मैं कब सदाशिव को भजूँगा?

हिन्दी अर्थ– सुन्दर ललाट वाले भगवान चन्द्रशेखर में मन को एकाग्र करके अपने कुविचारों को त्यागकर गंगा जी के तटवर्ती वन के भीतर रहता हुआ सिर पर हाथ जोड़ डबडबाई हुई विह्वल आँखों से शिव मंत्र का उच्चारण करता हुआ मैं कब सुखी होऊंगा?

देवांगनाओं के सिर में गुथे पुष्पों की मालाओ के झड़ते हुए सुगंध में पराग से मनोहर परम शोभा के धाम महादेवजी के अंगो की सुन्दरता परमानंद युक्त हमारे मन की प्रसन्नता को सदा बढ़ाती रहे।

प्रचन्ड वाडवानल की भांति पापों को भस्म करने में स्त्री स्वरूपिणी अणिमादि अष्ट महासिद्धिओ तथा चंचल नेत्रों वाली देव कन्याओ से शिव विवाह समय में गान की गई मंगल ध्वनि, सब मंत्रो में परम श्रेष्ठ शिव मंत्र से मोहित सांसारिक दुखों को नष्ट करके विजय पाए।

हिन्दी अर्थ– जो मनुष्य इस उत्तमोत्तम स्तोत्र का नित्य पाठ, स्मरण और वर्णन करता है, वह सदा शुद्ध रहता है और शीघ्र हि भगवान शंकर की भक्ति प्राप्त कर लेता है। इस भक्ति के लिए कोई दूसरा मार्ग या उपाय नहीं है। बस शिव का विचार ही भ्रम को दूर कर देता है।

हिन्दी अर्थ– सायंकाल में पूजा समाप्त होने पर जो रावण के गाए हुए इस स्तोत्र का पाठ करता है, भगवान शंकर उसे रथ, हाथी, घोड़ों से युक्त सदा स्थिर रहने वाली संपत्ति प्रदान करते हैं।

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