राम-रावण द्वंद्व युद्ध में राम द्वारा रावण मारा गया। उसके मरते ही उसके सैनिक भाग कर लंका नगर में चले गए।
विभीषण का विलाप और राम का रावण के अंतिम संस्कार के लिए कहना
लेकिन अपने भाई के मृत शरीर को रणभूमि ने पड़े देख कर विभीषण भावुक हो गए। वे विलाप करने लगे। राम ने उन्हे समझा कर शान्त किया। उन्होने रावण के विधिवत अंतिम संस्कार करने के लिए विभीषण से कहा। उन्होने विभीषण से कहा “शत्रुता जीवित होते ही होती है, मृतक से नहीं।”
अन्तःपुर की स्त्रियों का रोते हुए रणभूमि आना
तब तक रावण के मरने की खबर लंका नगर में भी फैल गई। उसकी स्त्रियाँ अंतःपुर से रोते हुए बाहर आ गई। लंका की स्त्रियाँ रानियों के साथ-साथ रोते और विलाप करते हुए नगर के उत्तरी द्वार से रणभूमि में आ गईं। कुछ पुरुषों ने उन्हे रोकने का प्रयास किया। पर जब वे नहीं रुकीं तब वे भी उनके साथ रणभूमि में आ गए। रणभूमि में वे सब अपने पतियों के शवों को ढूँढती और रोते हुए घूमने लगीं।
रावण की पत्नियाँ अपने पति के शव के पास विलख कर रोने लगीं। उसकी पटरानी और प्रिय पत्नी मंदोदरी के विलाप से सभी अधीर हो गए। राम की आज्ञा के अनुसार विभीषण ने विधिवत रूप से रावण का अंतिम संस्कार किया।
विभीषण का राज्याभिषेक
सारथी मातलि देवराज इन्द्र के रथ को राम की आज्ञा से वापस लेकर चला गया। राम के आदेश से लक्ष्मण ने अन्य प्रमुख नायकों के साथ लंका में जाकर यथोचित रूप से विभीषण का राज्याभिषेक कराया।
राज्याभिषेक के बाद विभीषण अपनी प्रजा को सांत्वना देकर राम के पास आए। नगरवासियों ने विभीषण को दही, अक्षत, मिठाई, लावा, फूल आदि मांगलिक वस्तु उपहार में दिया। विभीषण ने यह सब राम और लक्ष्मण को भेट किया। विभीषण की प्रसन्नता के लिए राम ने इन मांगलिक वस्तुओं को ले लिया लेकिन बाद में विभीषण द्वारा देने पर बहुमूल्य उपहार नहीं लिया।
हनुमान का सीता को जीत की सूचना देना
राम ने हनुमान से सीता को विजय की सूचना देते हुए उनका हालचाल लेने भेजा। हनुमान ने अशोक वाटिका में जाकर सीता को यह शुभ समाचार सुनाया। उन्होने सीता को सांत्वना दी कि वे लंका में रहने के कारण अपने को अब बंदिनी नहीं समझे। क्योकि अब वहाँ के राजा विभीषण हैं।
उन्हें उन रक्षक राक्षसियों पर क्रोध था जो सीता को सताया करती थीं। उन्होने उन्हे दण्ड देने के लिए आज्ञा मांगा। लेकिन सीता ने किसी को दण्ड देने से मना कर दिया क्योंकि वे सब तो रावण के आदेश के अधीन थी। सीता का संदेश लेकर हनुमान वापस आ गए।
सीता को राम के पास लाया जाना
युद्ध में विजय की सूचना हनुमान द्वारा सीता को मिल चुकी थी। राज्याभिषेक के बाद राम ने विभीषण से सीता को लाने के लिए कहा। विभीषण ने पहले स्त्रियों को अशोक वाटिका में सूचना देने के लिए भेजा। फिर सीता से जाकर स्नान और शृंगार कर राम के पास चलने के लिए कहा। सीता राम के दर्शन के लिए तुरंत ही जाना चाहती थी। लेकिन जब विभीषण के बताया कि ऐसी राम की आज्ञा है तो वे मान गई।
सीता को सम्मान पूर्वक सिर से स्नान करा कर सुंदर बहुमूल्य वस्त्र-आभूषण पहनाए गए। उन्होने लाल रंग की सुंदर साड़ी पहनी थी।
शिबिका (पालकी) पर सीता को लेकर राक्षस गण राम के पास चले। कुछ रक्षक भी उनके साथ चल रहे थे। नगर के बाहर जहाँ राम, लक्ष्मण अपने साथियों के साथ थे, वहाँ शिबिका लाया गया। वहाँ वानर सैनिकों की भीड़ थी।
सीता के साथ आए रक्षक उन्हे एक छोटे डंडे से हटा कर शिबिका को ले जाने के लिए रास्ता बना रहे थे। वानर सैनिक थोड़े-गिरते पड़ते दूर हट जाते थे। हटाए जाए जाने वाले वानर के मुख पर उद्वेग होता था।
राम द्वारा सीता को पैदल बिना किसी पर्दा के लाने के लिए कहना
राम ने जब यह देखा तो उन्हे पसंद नहीं आया। उन्होने विभीषण से सीता को पैदल ही लाने के लिए कहा ताकि वानरों को कोई कष्ट न हो और सभी वानर उन्हे देख सके। उन्होने ने विभीषण से कहा “घर, वस्त्र, और चहारदिवारी आदि वस्तुएं स्त्री के लिए पर्दा (आवरण) नहीं हुआ करते। इस तरह लोगों को दूर हटाने के जो निष्ठुरतापूर्ण व्यवहार हैं, वे भी स्त्री के लिए आवरण का काम नही देते। पति से प्राप्त होने वाले सत्कार तथा नारी के अपने सदाचार– ये ही उसके अपने आवरण हैं।”
उन्होने यह भी कहा कि “विपत्ति काल में, शारीरिक या मानसिक पीड़ा के अवसर पर, युद्ध में, स्वयंवर में, यज्ञ में और विवाह में स्त्री का दिखना दोष की बात नहीं है। सीता इस समय विपत्ति में है। मानसिक कष्ट से भी युक्त है। मेरे पास है। इसलिए इसका पर्दे के बिना बाहर आना दोष की बात नहीं है। इसलिए उन्हे शिबिका छोड़ कर पैदल ही मेरे पास ले आओ और ये सब वानर उनका दर्शन करे।”
सीता और राम का मिलन
राम के आज्ञा के अनुसार ऐसे ही सीता उनके पास लायी गईं। वे राम के पास खड़ी हो गईं। रक्षक सब थोड़े दूर हट कर खड़े हो गए। राक्षस और राक्षसियां, जो सीता के साथ लंका से आए थे और राम के सभी सहयोगी उस समय वहीं थे। इस विशाल जन समूह के बीच राम के बगल में सीता खड़ी थीं। पास में ही लक्ष्मण खड़े थे।

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