राम अपने वनवास काल का अधिकांश भाग इन तीन स्थानों में रहे थे।
चित्रकूट
(वर्तमान उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर)
वनवास काल में चित्रकूट राम का पहला आश्रय स्थल था। यहाँ उन्होनें मन्दाकिनी नदी के किनारे पर्ण कुटी बनाया था। जब वे अयोध्या से निकले तो प्रयाग होते हुए यहीं आए थे। यहाँ निवास करने का सुझाव उन्हे भारद्वाज मुनि ने प्रयाग में दिया था। लेकिन वे यहाँ ज्यादा दिन तक नहीं रह रहें। हुआ यह कि जब उन्हें घर से आए हुए कुछ ही दिन हुए थे, तब अयोध्या से उनके भाई भरत बहुत से सगे-संबंधियों, नगरवासियों और सैनिकों के साथ उन्हें मना कर अयोध्या लौटाने के लिए आए।
राज परिवार के इतने सारे लोगों के आने से चित्रकूट में रहने वाले स्थानीय लोगों और ऋषि-मुनियों में यह प्रचारित हो गया कि वहाँ अयोध्या के राजकुमार रहते हैं। विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा के लिए राम-लक्ष्मण दोनों भाई उस समय से करीब 12-13 साल पहले ही, जब वे अल्पव्यस्क किशोर थे, तभी कई राक्षसों को मार चुके थे। अतः राक्षस उन्हें अपना शत्रु मानते थे। इस क्षेत्र में रावण के भाई खर नामक राक्षस का आतंक था। राम के वहाँ रहने से वहाँ राक्षसों के हमले का ख़तरा बढ़ गया था।
दूसरा कारण यह था कि अयोध्या से आने वाले इतने अधिक लोगों और उनके सवारी पशुओं के कारण उस क्षेत्र में गंदगी फैल गई थी।
इन दोनों कारणों से चित्रकूट में रहने वाले ऋषि-मुनि वहाँ से अन्यत्र जाने लगे। जब राम को यह पता चला तो उन्होंने सोचा उनके कारण वहाँ के लोगों पर ख़तरा हो सकता था। फिर अयोध्या के उनके परिजन वहाँ आए थे, जिनकी स्मृति उनके लिए कष्टकारी भी हो रही थी। उनके परिजन फिर उनसे मिलने आ सकते थे, क्योंकि अयोध्या से चित्रकूट बहुत दूर नहीं था और उनका आश्रम अब सबको ज्ञात हो चुका था। इससे वहाँ के स्थानीय निवासियों को परेशानी होती।
इन्हीं सब कारणों से राम ने चित्रकूट छोड़ देने का विचार किया।
राम, लक्ष्मण और सीता चित्रकूट के वन से निकल कर अन्यत्र जाने के लिए चले। रास्ते में वे वयोवृद्ध ऋषि अत्रि और उनकी परम तपस्विनी पत्नी अनसूया से मिलने उनके आश्रम गए। अत्रि ऋषि ने उन्हें दंड्कारण्य में रहने का सुझाव दिया। यद्यपि उन्होंने वहाँ के ख़तरे के विषय में चेतावनी भी दिया।
दंड्कारण्य
(वर्तमान छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग)
दंड्कारण्य एक विस्तृत पर्वतीय और वनीय क्षेत्र था। यहाँ राक्षस आदि का ख़तरा था तो कई ऋषियों के आश्रम भी थे। राम ने अपने वनवास का सबसे अधिक भाग यहीं व्यतीत किया। लेकिन यहाँ उन्होंने कोई आश्रम या पर्ण कुटी नहीं बनाया। बल्कि अपने भक्त ऋषियों के आश्रम में कुछ-कुछ दिन रहते रहे। इस तरह रहते हुए उन्होंने दस वर्ष व्यतीत किए।
जब वे सुतीक्ष्य मुनि के आश्रम में थे, तब ये सारे मुनि उनके अपने आश्रम में रहने के लिए प्रार्थना लेकर आए थे। सुतीक्ष्य मुनि चाहते थे कि राम उनके आश्रम में ही रहे। उन्होंने राम के सत्कार के लिए ही शरीर त्याग नहीं किया था। लेकिन राम केवल एक रात वहाँ रुके। तब सुतीक्ष्य मुनि ने इन सब मुनियों की इच्छा पूरी करने के बाद पुनः अपने आश्रम में आने का वचन राम से लिया।
अपने वचन के अनुसार अनेक मुनियों के आश्रम में कुछ-कुछ समय रहने के बाद लगभग दस वर्षों बाद पुनः सुतीक्ष्य मुनि के आश्रम में आए।
अब तक वनवास की अवधि का अधिकांश भाग बीत चुका था। इन विभिन्न मुनियों के आश्रम में रहते समय मुनियों ने उन्हें राक्षसों के अत्याचार का वर्णन कर उन्हें मार कर मुनियों को अभय करने की प्रार्थना की थी। राम ने उन्हें राक्षस वध करने का वचन भी दिया था।
लेकिन ये राक्षस किसी मुनि के आश्रम पर प्रत्यक्ष रूप से आक्रमण नहीं करते थे। बल्कि अकेले या असावधान अवस्था में मिलने पर उन्हें मार डालते थे। इसलिए आश्रम में रहते हुए किसी राक्षस से इतने दिनों में उनका सामना नहीं हुआ। अकारण राक्षसों को मारना धर्म विरुद्ध होता। इसलिए अब उन्होंने मुनियों के आश्रम से अलग कहीं ऐसे जगह रहने का निश्चय किया जहाँ राक्षस आकर स्वयं उनसे शत्रुता कर सके।
अभी तक राम इस क्षेत्र में रहने वाले अपने भक्त अधिकांश ऋषियों से मिल चुके थे। केवल अगस्त और उनके भाई से नहीं मिले थे। अतः सुतीक्ष्य मुनि से अनुमति ले कर वे अगस्त और उनके भाई के आश्रम जाकर उनसे मिले। अगस्त ऋषि ने उन्हें कई दिव्य अस्त्र भी दिए। क्योंकि वे जानते थे कि भक्तों की मनोकामना पूरी करने के कार्य सम्पन्न होने के बाद अब राक्षस वध का कार्य शुरू होने वाला था। अगस्त मुनि ने ही उन्हें अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए पंचवटी में रहने का सुझाव दिया।
पंचवटी
(वर्तमान में महाराष्ट्र के नासिक जिले में)
पंचवटी निवास का मूल उद्देश्य राक्षसों का संहार ही था। अभी तक उनके वनवास की अवधि का लगभग 11-12 वर्ष बीत चुका था। बाकी बचे अवधि भी वे उन आश्रमों में बिता सकते थे। लेकिन वे प्रत्यक्ष रूप से अलग और अकेले दिखना चाहते थे ताकि राक्षस आकर उनसे शत्रुता करें। पंचवटी में राक्षसों का आतंक अपेक्षाकृत अधिक था। खर, दूषण आदि हजारों राक्षसों का निवास स्थान इसके पास ही था। पति की मृत्यु के बाद रावण की बहन शूर्पनखा भी अभी यहीं अपने भाइयों के पास रह रही थी।
इन्हीं सब कारणों से पंचवटी में गोदावरि नदी के किनारे राम ने पर्णकुटी (पत्ते की झोपड़ी) या आश्रम बना कर रहना शुरू किया। पंचवटी में रहने का सुझाव उन्हें अगस्त मुनि ने दिया था और गोदावरि के किनारे स्थित उस रमणीक स्थान पर आश्रम बनाने का सुझाव जटायु ने दिया था।
जिस उद्देश्य से राम पंचवटी आए थे, वह पूरा हुआ। पंचवटी स्थित गोदावरि तट के इसी आश्रम में शूर्पनखा का आगमन हुआ और यहीं से रावण द्वारा सीता के अपहरण के बाद राक्षस वध का कार्य शुरू हुआ।
