राम ने अपने वनवास काल में चित्रकूट के बाद दंड्कारण्य को अपना दूसरा निवास बनाया था। दंड्कारण्य एक दुर्गम वन था। वहाँ राक्षस और अन्य ख़तरे चित्रकूट की अपेक्षा अधिक थे। ऋषि अत्रि ने उन्हें पहले ही इन खतरों की चेतावनी दे दी थी। लेकिन दुष्ट राक्षसों का वध और अपने भक्तों पर कृपा यही तो उनके अवतार का उद्देश्य था। दंड्कारण्य में सबसे पहले जिस राक्षस से उनका सामना हुआ उसका नाम विराध था। यह प्रसंग वाल्मीकि रामायण में इस तरह है।
राम जब लक्ष्मण और सीता के साथ दंड्कारण्य में रहने के लिए आए तो रास्ते में पड़ने वाले मुनि के आश्रमों में जाकर उनसे मिलते और सत्कार पाते हुए अपने गंतव्य की तरफ बढ़ रहे थे। दंड्कारण्य में अभी राम ने अपना कोई निवास नहीं बनाया था। जब इस तरह वे पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण से साथ बातें करते हुए रास्ते में बढ़े चले जा रहे थे, तभी उसी रास्ते से आता हुआ उन्हे विराध दिखा।
विराध कौन था?
विराध विशाल व बेडौल आकार और डरावने मुख वाला नरभक्षी राक्षस था। वह कई जंगली पशुओं को मार कर बड़े से लोहे के भाले में सब को गूँथ कर अपने कंधे पर रखे हुए था। उसने बाघ के छाल का वस्त्र पहन रखा था, जो कि खून से गीला हो रहा था।
विराध को कुबेर का शाप और ब्रह्मा का वरदान मिलना
विराध वास्तव में तुंबरू नामक गंधर्व था। एक बार वह अपनी प्रेमिका अप्सरा रंभा के साथ था। अपने स्वामी कुबेर के बुलाने पर वह देर से पहुँचा। इस कारण कुबेर को क्रोध आ गया और उन्होंने राक्षस होने का शाप दे दिया था। बाद उन्होंने बताया कि युद्ध में दशरथ पुत्र राम के हाथों जब उसका वध होगा तभी मुक्त मिलेगी और अपना वास्तविक शरीर मिलेगा।
इस कारण तुबरू गंधर्व ने राक्षस वंश में विराध के रूप में जन्म लिया। उसके पिता का नाम राक्षस जव और माता का नाम शतह्रीदा था।
विराध द्वारा तपस्या करने पर ब्रह्मा ने उसे अस्त्र-शस्त्र द्वारा नहीं मरने का वरदान दिया था।
विराध द्वारा राम को ललकारना
जब राम, लक्ष्मण और सीता ने विराध को देखा तो उसने भी इन तीनों को देखा। वह अचानक हमलावर हो गया। वह तीव्र गति से सीता के पकड़ कर कुछ दूर ले गया। फिर वह वहाँ खड़ा होकर दोनों भाइयों से बोला कि वेश से तो वे संन्यासी लगते हैं लेकिन उन्होने क्षत्रिय की तरह अस्त्र धारण कर रखा है। अगर वे संन्यासी हैं तो साथ में स्त्री क्यों है और अगर क्षत्रिय हैं तो संन्यासी वस्त्र क्यों पहना है। इसलिए अवश्य ही वे दोनों कोई धोखेबाज़ हैं। उसने अपना नाम (विराध) बताते हुए कहा कि वह दोनों दुष्ट और धोखेबाज़ पुरुषों (भाइयों) को मार कर इस स्त्री को ले जाएगा।
उसने गरजते हुए दोनों भाइयों से पूछा “तुम दोनों कौन हो और कहाँ जाओगे? इस पर राम ने अपना परिचय देकर विराध से उसका परिचय पूछा। राम ने परिचय में केवल अपने को ईक्ष्वाकु वंश का क्षत्रिय बताया। अपने या अपने पिता का नाम नहीं लिया।
राम द्वारा विराध का वध
विराध ने राम-लक्ष्मण से अपने “साथ की स्त्री” (सीता) को उसके पास छोड़ कर अपनी जान बचा लेने के लिए कहा। उसके इस बात से क्रोधित होकर राम ने सात बाण उसपर छोड़ा। लेकिन वरदान के कारण वह केवल घायल हुआ, मरा नहीं।
घायल विराध सीता को छोड़ कर शूल लेकर राम-लक्ष्मण की तरफ झपटा। उसने दोनों भाइयों को अपने कंधे पर बैठा कर घने जंगल की तरफ दौड़ लगा दिया। दोनों भाई भी बिना किसी प्रतिरोध के उसके कंधे पर बैठ गए। पर कुछ ही देर बाद उन्होने विराध के दोनों बाँहों को तोड़ दिया। इस पर वह विशाल राक्षस दर्द से कराहता हुआ बेहोश होकर धरती पर गिर गया।
होश आने पर फिर से लड़ाई हुआ। वरदान के कारण अस्त्र-शस्त्र या किसी प्रकार के प्रहार से वह नहीं मर रहा था। इसलिए राम ने उसे जीवित ही धरती में गाड़ देने के लिए लक्ष्मण से गड्ढा खोदने के लिए कहा। वे स्वयं उसकी गर्दन पर पैर रख कर खड़े हो गए।
राम की यह बात सुनकर विराध ने उन्हें पहचान लिया। और बोला “मैं मोहवश आपको पहचान नहीं सका। आप दोनों राम-लक्ष्मण है।” राम ने अपने या अपने पिता का नाम नहीं बताया था इसलिए विराध पहले उन्हे नहीं पहचान सका।
विराध की मुक्ति
जब उसे पता चला कि वह राम के हाथों मारा जा रहा है, जो कि कुबेर के अनुसार उसकी शाप से मुक्ति का जरिया था, तो वह खुश हो गया। राक्षसों की परंपरा के अनुसार मृत होने पर उन्हे जमीन में ही गाड़ा जाता था। अतः विराध का यह अंत उस परंपरा के अनुसार ही था। गड्ढे में दबाने के बाद विराध अपना पूर्व गंधर्व शरीर पाकर अपने लोक चला गया।
लेकिन शरीर छोड़ने से पहले उसने राम से वहाँ से डेढ़ योजन दूर स्थित शरभंग ऋषि के आश्रम के जाकर उनसे मिलने के लिए कहा। विराध को मुक्त कर उसके कथनानुसार तीनों शरभंग मुनि के आश्रम गए।
