लंका पर आक्रमण के लिए रणनीति
अब राम लंका के विरुद्ध युद्ध करने के लिए कूच करने की योजना बनाने लगे। समुद्र पार करने के लिए राम चिंतित थे, लेकिन सुग्रीव ने उन्हे भरोसा दिया। हनुमान ने लंका के फाटक, दुर्ग (किला), सेना विभाग आदि की जानकारी दी, जिससे लंका विजय की योजना बनाया जा सके।
लंका के विरुद्ध राम की वानर सेना का प्रयाण
संपूर्ण योजना बना कर राम ने समस्त सेना को कूच करने का आदेश दे दिया। सेना को कड़ा आदेश था कि रास्ते में पड़ने वाले नगर या वनों को किसी तरह की हानि नहीं पहुंचाए। समस्त सेना टुकड़ियों में बाँटी गई। उनके सेनापतियों को सुरक्षा और अनुशासन का पूर्ण पालन करना था।
सेना के पिछले हिस्से के सुरक्षा का भी ख्याल रखा गया था। मार्ग में इस बात का भी ध्यान रखा गया था कि कहीं रास्ते में राक्षस सेना छुपी न हो, जो आगे बढ़ती सेना पर पीछे से आक्रमण कर दे। अस्त्र-शस्त्र, कवच, हस्तत्राण (चमड़े का बना दस्ताना, ताकि तीर चलाते हुए हाथ न कटे) आदि युद्ध सामग्रियों का पूर्ण सावधानी से निरीक्षण कर लिया गया।
समस्त वानर सेना रावण के विरुद्ध रोष से भरी और युद्ध के लिए उत्साहित थी। दोपहर में, जब विजय नामक शुभ मुहूर्त था, सेना ने लंका के विरुद्ध कूच किया। इस विशाल सेना में वानर के अलावा लंगूर और रीछ के भी दस्ते (सैन्य टुकड़ियाँ) थे।
समुद्र तट पर सेना का पड़ाव
समुद्र के किनारे पहुँच कर सेना ने पड़ाव डाला। सैन्य शिविर की सुरक्षा और अन्य व्यवस्था करने के बाद अब विचार शुरू हुआ कि समुद्र को कैसे पार किया जाए।
रावण द्वारा युद्ध की तैयारी
इधर रावण के गुप्तचरों ने राम के सेना सहित समुद्र तट तक पहुँच जाने की सूचना दी। यद्यपि उसे विश्वास था कि ये नर (राम-लक्ष्मण) और वानर इतने विशाल समुद्र को पार नहीं कर सकते। फिर भी युद्धनीति को ध्यान में रखते हुए उसने अपने मंत्रियों के साथ बैठक किया।
इस बैठक में अधिकांश मंत्रियों ने रावण और मेघनाद के बल और पराक्रम का वर्णन करते हुए राम पर जीत का पक्का भरोसा दिलाया। प्रहस्त, दुरमुख, वज्रदंष्ट्र, निकुक्म्भ आदि ने शत्रु सेना को मारने के लिए अपना उत्साह दिखाया।
विभीषण द्वारा सीता को लौटाने की सलाह
लेकिन रावण का छोटा भाई विभीषण इस विचार से सहमत नहीं था। उसने राम को अजेय बताते हुए उन्हे सीता लौटा देने का अनुरोध किया। लेकिन रावण उसकी बात को अनसुना कर उठ कर महल में चला गया।
अगले दिन विभीषण फिर रावण के महल में जाकर उससे मिला। उसने लंका में होने वाले अपशकुनों को बताकर उसे फिर सीता लौटा देने के लिए प्रार्थना किया। लेकिन रावण ने अपने बल का बखान कर राम को जीत लेने का दावा किया और विभीषण को वहाँ से निकाल दिया।
रावण द्वारा नगर के सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा और सीता के प्रति अपनी आसक्ति स्वीकारना
उस दिन रावण ने सभाभवन ने फिर इस विषय पर विचार किया। चूँकि शत्रु नजदीक आ गया था। इसलिए नगर की रक्षा के लिए जो प्रबंध थे उसकी फिर से समीक्षा की गई और आवश्यक निर्देश दिए गए।
इस सभा में रावण ने वह कारण बताया जिस से उसने सीता का हरण किया था। उसने यह भी बताया कि उसने किन युक्तियों द्वारा सीता का अपहरण किया। यह सब बताने के बाद उसने यह स्वीकार किया कि सीता में उसकी आसक्ति थी। समस्त स्थिति बताने के बाद उसने सभासदों से उनकी राय मांगी।
कुंभकर्ण द्वारा रावण का विरोध
इस सभा में कुंभकर्ण भी था। वह छह महीने, और कभी-कभी ज्यादा समय तक भी, सोता रहता था। फिर उठता था, खा-पी कर कुछ बातचीत कर के फिर सो जाता था। इस दिन वह उठा हुआ था। इसके बाद लड़ाई के समय हारने लगने पर ही रावण ने उसे उठाया था, जब राम के हाथों वह मारा गया।
रावण का सीता के प्रति आसक्ति और चुरा कर उसे ले आने के विषय में जब कुंभकर्ण ने सुना तब उसे क्रोध आ गया। उसने इसे अन्यायपूर्ण बताकर रावण को फटकारा। लेकिन फिर भी जरूरत होने पर लंका के लिए शत्रुओं से लड़ने का संकल्प व्यक्त किया।
रावण ने जब समस्त सभासदों के समक्ष सीता के प्रति अपनी आसक्ति को स्वीकारा और कुंभकर्ण ने उसे डांट दिया। तब उसी सभा में बैठे महापार्श्व नामक सभासद ने रावण से कहा कि अगर वह सीता को इतना ही चाहता है तो उसे बलपूर्वक अपना लेना चाहिए। युद्ध में तो वे लोग राम और उसकी सेना का सामना कर ही लेंगे।
रावण द्वारा सभा में अपने शाप की बात स्वीकार करना
इस पर रावण ने अपने शाप की बात बताया। उसने बताया कि एक बार उसने ब्रहमा से मिलने जाते समय एक अप्सरा पुंजिकस्थला का बलात्कार किया था। इससे क्रुद्ध होकर ब्रहमा ने उसे शाप दे दिया था कि अगर वह किसी स्त्री से उसकी इच्छा के बिना संभोग करेगा, तो उसके मस्तक के सौ टुकड़े हो जाएँगे। इसी शाप के कारण वह सीता पर बल प्रयोग नहीं कर सकता था।
विभीषण द्वारा रावण का परित्याग कर राम की शरण लेना
इस सभा में फिर विभीषण ने रावण से सीता को लौटा देने का सलाह दिया। लेकिन रावण का पुत्र मेघनाद उन्हे डरपोक कह कर उनका मजाक उड़ाने लगा। रावण ने भी कठोर और अपमानजनक शब्द कहा। साथ ही यह भी कहा कि भाई होने के कारण उन्हे जीवित छोड़ रहा है, अगर कोई और ऐसी बात कहता तो उसे मार डाला होता। उसने विभीषण को पैरों से मारा।
इस प्रकार जब रावण ने विभीषण को अपमानित किया तब वे अपने चार रक्षकों के साथ उठ खड़े हुए और रावण को अंतिम चेतावनी देते हुए लंका के लिए शुभकामना दिया। अपनी पत्नी और बच्चों को लंका में ही छोड़ कर वे आकाशमार्ग से राम के पास चल पड़े।
विभीषण को शरण का प्रश्न
इस समय राम समुद्र के तट पर पड़ाव डाले हुए समुद्र पार करने की प्रतीक्षा कर रहे थे। इसी समय विभीषण को चार राक्षसों के साथ आते देखा। विभीषण ने अपना सत्य परिचय देकर शरण की प्रार्थना की।
सुग्रीव आदि अधिकांश प्रमुख सेनापति विभीषण के शत्रु का गुप्तचर हो सकने की संभावना के कारण उन्हे शरण देने के पक्ष में नहीं थे। लेकिन हनुमान उन्हे शरण देने के पक्ष में थे। शरणागत की रक्षा करने की प्रतिज्ञा राम की भी थी। इसलिए विचार-विमर्श के बाद विभीषण को शरण देने का निर्णय राम ने लिया।
विभीषण को अपनाने के बाद राम ने उनसे रावण की शक्ति आदि के विषय में पूछा। फिर उन्होने रावण को मार कर विभीषण को लंका की राजगद्दी पर अभिषिक्त करने की प्रतिज्ञा ली।

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