भरत द्वारा राम के पास वन में जाने का विचार
जब कैकेयी ने वरदान माँगा तब भरत-शत्रुघ्न अपने राज्य में नहीं थे। यहाँ आने के बाद उन्हें पिता की मृत्यु और भाइयों के वनवास का पता चला। दिवंगत राजा दशरथ का अंतिम संस्कार सम्पन्न हो जाने के बाद राज्य के सभी उच्च अधिकारियों ने एक सभा बुलाया जिसमे भरत को राजा बनाने का प्रस्ताव रखा गया। यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास हुआ।
लेकिन भरत ने इसे धर्म विरुद्ध और अनुचित बताया कि बड़े भाई के रहते छोटे का राज्याभिषेक हो। उन्होने राम के बदले स्वयं वन में रहने और राम को राजा बनाने का प्रस्ताव दिया। यह सहमति बनी कि भरत अपने सगे-संबंधियों, उच्चाधिकारियों और सैनिकों के साथ वन में जाएँगे। वहीं राम का राज्याभिषेक होगा। सभी मिलकर राम को वापस अयोध्या आने के लिए मनाएंगे।
राम के पास जाने की तैयारी
राम को लाने के लिए भरत के साथ राजपरिवार से सभी सदस्य, सभासद, सेना, नगरवासी इत्यादि के भी साथ जाने का निर्णय था। सबको ले जाने का कारण यह था कि सबके कहने पर शायद राम अपना निर्णय बदल ले और अयोध्या लौट आए। सुरक्षा के लिए सेना थी।
पर इतने सारे लोगों के जाने के लिए विशेष प्रशासनिक प्रबंध की जरूरत थी। सबके लिए भोजन, आवास आदि की व्यवस्था होनी थी। रास्ते अच्छे चाहिए थे। इसी तैयारी के तहत अयोध्या से कोसल जनपद की सीमा पर स्थित गंगा तट तक के लिए राजमार्ग के निर्माण कार्य का आदेश हुआ। ये ज़िम्मेदारी शत्रुघ्न को दी गई।
भरत ने अपने को राम का मंत्री और सेवक मानते हुए किसी भी प्रकार का राजकीय चिह्न धारण नहीं किया। राजा के लिए बजने वाले प्रातःकालीन मंगल वाद्य को भी उन्होने अपने लिए नहीं बजने दिया।
भरत का राम से मिलने के लिए यात्रा
समस्त तैयारी कर भरत और शत्रुघ्न काफिले के साथ राम से मिलने के लिए निकले। उनके साथ सभी रानियाँ, गुरु, मंत्री, सभासद आदि थे। उद्देश्य था राम को वापस लौटने के लिए मनाना। अगर फिर भी राम लौटने के लिए तैयार नहीं होते तो लक्ष्मण की तरह भरत भी राम के साथ वन में रहते।
भरत के साथ इस काफिले की यात्रा सुबह में शुरू हुई। यात्रा का मार्ग वही था जो राम का था। राम के साथ गंगा तक जाने वाले सुमंत्र भी इनके साथ थे। राम की तरह ही रात इन लोगों ने श्रिंगवेरपुर में गुजारी।
निषादराज गुह से भरत का मिलना
भरत के साथ सेना देख कर गुह को उनकी मंशा पर संदेह हुआ। लेकिन बाद में मिलने पर जब उन्होने जाना कि वे राम को मनाने के लिए जा रहे है, तो उन्होने उन सबका आतिथ्य किया। राम के मित्र और सहायक जान कर भरत भी उनसे बड़े प्रेम से मिले। राम और सीता ने जिस शय्या पर विश्राम किया था उसे देख कर सभी भावुक हो गए।
भारद्वाज मुनि से भरत का मिलना
गुह की सहायता से सब ने गंगा पार किया। अगले दिन वे सब प्रयाग में भारद्वाज के उसी आश्रम में पहुँचे, जहाँ राम रुके थे। पहले दोनों भाई अकेले ही गए लेकिन मुनि के कहने पर सेना सहित सब लोगों को बुलाया। मुनि ने अपने तप बल से सब के लिए अच्छे भोजन और आवास की व्यवस्था किया।
पारस्परिक परिचय, कुशलमंगल आदि बातों के बाद भरत के पूछने पर भारद्वाज ने चित्रकूट का पता बता दिया जहाँ राम रह रहे थे। राम को चित्रकूट जाने की सलाह और रास्ते की जानकारी उन्होने ही दी थी इसलिए उन्हें पता था कि राम कहाँ गए थे।
सुबह होने पर भरत अपने विशाल समूह के साथ चित्रकूट के लिए चल पड़े।
भरत का चित्रकूट पहुँचना
इधर चित्रकूट में राम, लक्ष्मण और सीता मन्दाकिनी के किनारे घूमने के बाद एक जगह बैठे हुए थे, तो उन्होने वन के पशु-पक्षियों के भागते हुए देखा। दूर से कोलाहल और धूल भी दिख रहा था। इस तपोवन में शिकार या युद्ध के लिए किसी राजा का आना तर्कसंगत नहीं था। इसलिए राम ने लक्ष्मण से वस्तुस्थिति देखने के लिए कहा।
लक्ष्मण ने जब एक ऊँचे शाल वृक्ष पर चढ़ कर देखा तो ध्वजा से पहचान गए कि यह भरत की सेना थी। सेना के साथ भरत को देख कर उनके नियत पर संदेह के कारण उन्हे कुछ रोष हुआ। लेकिन फिर राम के समझाने पर वे शांत हो गए।
इधर भरत ने भी इतनी सेना के साथ तपोवन में जाना उचित नहीं समझा। इसलिए पहाड़ के नीचे शिविर लगा कर सबको वहीं ठहरा दिया। भरत, शत्रुघ्न और गुह के साथ पैदल ही राम के आश्रम की खोज करते हुए बढ़े। सुमंत्र भी पीछे-पीछे आने लगे।
राम-भरत मिलन
आश्रम से निकलने वाले धुआँ और हवन की लकड़ियों, मार्गबोधक चिह्न आदि से भरत जंगल के बीच मनुष्य (ऋषियों) के वास स्थान को पहचान गए। इन्ही स्थानों में रोते हुए वे अपने भाई का आश्रम ढूँढने लगे। वे रो इसलिए रहे थे कि उनके भाई राजा के पुत्र हो कर यहाँ रह रहे थे। एक पर्ण कुटी में धनुष-बाण आदि अस्त्रों के साथ यज्ञ वेदी आदि देख कर वे पहचान गए। वहीं उन्होने जटा और मुनियों-सा वस्त्र पहने अपने भाई राम को देखा।
भाई राम को देखते ही भरत शोक से विलाप करते हुए उनकी ओर दौड़े। वे राम के पैर छूना चाहते थे, लेकिन उससे पहले ही भावातिरेक के कारण धरती पर गिर गए। आँसुओं से उनका गला रूँध गया। वे “हा! आर्य” के अतिरिक्त कुछ और नहीं बोल सके। शत्रुघ्न ने भी रोते हुए राम को प्रणाम किया। राम ने उठा कर दोनों भाइयों को सीने से लगा लिया।
फिर लक्ष्मण, निषादराज गुह और सुमंत्र भी मिले। इन परम वैभवशाली चारों राजकुमारों को वन में इस तरह देख कर स्थानीय वनवासी भी भावुक हो गए।
भरत द्वारा राम को पिता की मृत्यु की सूचना और राजा बनने की विनती
परस्पर हालचाल जानने के बाद राम ने भरत से उनके आगमन का प्रयोजन पूछा। भरत ने उनसे राज्य ग्रहण करने की विनती की। लेकिन राम ने मना कर दिया। अब भरत ने उनसे पुनः विनती करते हुए पिता की मृत्यु के विषय में बताया।
राम, लक्ष्मण और सीता द्वारा पिता के लिए पिण्डदान
पिता की मृत्यु का समाचार सुन कर राम-लक्ष्मण रोने लगे। कुछ देर रोने और शोक करने के बाद वे सभी मन्दाकिनी तट पर आए। वहाँ दोनों भाइयों और सीता ने पिता को जलांजलि देने के बाद उनके लिए पिंड दान किया। पिंडदान इंगुदी फल के पिसे हुए गूदे में बेर का फल मिला कर बनाए गए पिंड से किया।
अन्य अयोध्यावासियों का राम-लक्ष्मण से मिलन
मन्दाकिनी नदी के किनारे पिता को पिंड देते हुए वे सब रो पड़े। रोने की इस आवाज से पर्वत के नीचे शिविर में रुके हुए उनके सैनिकों ने समझ लिया कि भरत राम से मिल गए है। वे सब पैदल ही आवाज की दिशा में नदी की ओर भागे।
यद्यपि राम को अभी घर से आए अधिक दिन नहीं हुए थे। तथापि लोगों को लग रहा था कि कितने वर्षों से उनसे नहीं मिले थे। सब अधीर होकर उनके आश्रम की तरफ जाने लगे। कुछ लोग जल्दी के लिए सवारी से भी आने लगे। इससे उस क्षेत्र में तीव्र कोलाहल होने लगा। पशु-पक्षी डर कर इधर-उधर भागने लगे।
कुलगुरु वसिष्ठ के साथ माताएँ भी आ गईं। यथायोग्य परस्पर मिलन के बाद सब वहीं मन्दाकिनी नदी के तट पर एक जगह बैठे।
