“माँ! मेडुसा कौन थी?”
“क्यों? मेडुसा के बारे में किसने बताया तुम्हें?”
“बताओं न माँ।” श्रेय लाड़ दिखाते हुए बोला।
“यह एक ग्रीक पौराणिक चरित्र है। हालांकि इसे कभी देवी या ओलंपियन तो नहीं माना गया लेकिन यूरोप की कला और साहित्य में इसका चित्रण हुआ है।” मैंने संक्षेप में बता दिया।
“फेसबुक पर इसका एक फोटो है, इसके बालों में बहुत सारे साँप हैं, ऐसा क्यों? श्रेय ने उत्सुकता से पूछा।
“क्योंकि इसे ऐसा शाप मिला था। यह वहाँ की पवित्र पुजारिन थी। यह बहुत ही खूबसूरत थी। लेकिन इसने पुजारिन के किसी नियम को तोड़ा जिसके कारण इसे शाप मिला कि यह बहुत ही भयंकर एवं घिनौनी रूप वाली हो जाएगी और जो भी इसे देखेगा वह पत्थर में बदल जाएगा। इसीलिए इसका चेहरा भयंकर और हरे रंग का हो गया। बालों की जगह पर साँपों का गुच्छा हो गया।”
“हाउ स्कैरी!” पास ही बैठी 14 वर्ष की बेटी स्नेहा बोल उठी।
श्रेय भी अवाक सा होकर मुझे देख रहा था। 8 वर्ष के श्रेय के लिए जैसे इस कहानी पर विश्वास करना मुश्किल हो। “सच में माँ? ऐसा सच में हो सकता है क्या?”
“और नहीं तो क्या! हमारी माँ बहुत अच्छी हिस्ट्री टीचर है, यह तुम भूल रहे हो।… लेकिन… माँ उसने ऐसा क्या अपराध किया जो उसे ऐसा शाप मिला?” स्नेहा बोली।
“बालों के बदले साँप! हरे रंग का चेहरा! ये एलियन या साइंस फिक्शन कहानी तो नहीं है?” श्रेय बोला।
“माँ आप हमें डरा रही हो।”
“मेडुसा की पूरी कहानी सुनाओ न माँ।”
दोनों बच्चों के बहुत से सवाल। लेकिन मैं जवाब केवल इतना ही दे सकी “पौराणिक कहानियां इतिहास से अलग होती हैं। उनके सांकेतिक अर्थ होते हैं। समय और स्थान के अनुसार इन कहानियों के रूप भी बदलते रहते हैं इसलिए इसे सच या फिक्शन दोनों ही नहीं मानना चाहिए लेकिन बकवास कह कर खारिज भी नहीं किया जा सकता क्योंकि इन कहानियों का उस संस्कृति के लिए विशेष महत्त्व होता है।” मैं शिक्षिका वाले स्वर में बोली।
“अच्छा, सच या फिक्शन के बारे में नहीं बताओ, लेकिन यह तो बता दो कि मेडुसा ने ऐसा किया क्या था?”
स्वर तो श्रेय का था लेकिन सवाल दोनों भाई बहन का था। पर मैं समझ नहीं पा रही थी कि उन्हें सुनाऊँ या नहीं या शायद सुना भी दूँ तो वे समझ नहीं पाए। इसलिए उन दोनों को रात बहुत होने और सो जाने के लिए कह कर चली गई। सुबह उठ कर उन्हें स्कूल भी तो जाना था।
बच्चे सो पाए या नहीं मैं नहीं जानती, लेकिन मैं बहुत रात तक सो नहीं पायी। जाने क्यों मुझे मेडुसा की कहानी याद कर गार्गी की कहानी याद आ गई।
गार्गी मेरी विद्यार्थी थी। दिखने में जितनी ही सुंदर उतनी ही समझदार। बहुत मेहनती तो नहीं कहूँगी लेकिन उसकी यदाश्त बहुत अच्छी थी। चीजों को जल्दी समझ लेती थी। इसलिए कम समय देकर भी हमेशा अच्छे नंबर ले ही आया करती थी। मेरे विषय इतिहास में तो उसे बिल्कुल ही रुचि नहीं थी लेकिन इसमें भी उसे इतने अंक आ ही जाते थे कि अच्छे से परीक्षा पास हो जाए।
व्यवहार ऐसा था कि शिक्षक और विद्यार्थी दोनों में ही बहुत लोकप्रिय थी। हंसमुख और हाजिरजवाब। शिक्षकों के लिए विनम्र छात्रा, सहपाठियों के लिए हरदम हंसी मज़ाक करने वाली दोस्त, सीनियर-जूनियर विद्यार्थियों और स्कूल कर्मचारियों के लिए मिलनसार और मदद करने के लिए तत्पर।
लड़कों के बीच विशेष रूप से आकर्षण का केंद्र थी वह। दोस्तना और स्वच्छंद। फैशन का शौक तो शुरू से ही था पर ड्रेस कोड होने के कारण स्कूल में डिजायनर कपड़े तो नहीं पहन पाती फिर भी उसकी अभिरुचि, उसके स्टाइल और फैशन के सब कायल होते थे।
स्कूल प्रशासन के सामने उसकी पहली शिकायत आई थी जब वह क्लास नौ में पढ़ती थी। शिकायत यह थी कि वह निषिद्ध स्थान पर स्कूल के किसी लड़के के साथ बैठी थी। उसकी सफाई थी कि वह केवल कोर्स संबंधी बाते कर रही थी। उसकी पहली गलती थी इसलिए डांट कर और चेतावनी देकर छोड़ दिया गया।
स्कूल के बाद उसका एडमिशन रांची के एक अच्छे कॉलेज में हो गया। होता भी क्यों नहीं उसके पिता इंजीनियरिंग कॉलेज के प्रोफेसर और माँ एक स्वतंत्र लेखिका थे। जमीन जायदाद भी अच्छी थी। गार्गी उनकी इकलौती बेटी थी। गार्गी के भाई को पढ़ने लिखने में कोई विशेष रुचि नहीं थी। इसलिए माँ बाप दोनों चाहते थे कि बेटी को इतना पढ़ाएँ कि वह ऊंचे पद पर जाए और माँ बाप के सामाजिक सम्मान को बढ़ाए। इसलिए उसे रांची के सबसे अच्छे कान्वेंट स्कूल में और अब सबसे अच्छे कॉलेज में दाखिला दिलवाया गया था।
एक दिन जब मैं स्कूल से लौट रही थी तो गार्गी को किसी लड़के के साथ बाइक पर जाते देखी। गार्गी ने भी मुझे देख लिया। वह बाइक रुकवा कर उतरी। उसने पास आकर मुझे प्रणाम किया और उस लड़के से मेरा परिचय करवाया। वह रोहित था, उसका क्लासमेट। उसके पिता झारखंड में कोयले खदान के सबसे बड़े ठेकेदार थे। रोहित इकलौता बेटा होने के कारण उनकी सारी संपत्ति का अकेला उत्तराधिकारी था। पढ़ने में भी अच्छा था। वह जिम्मेदार था। इतने पैसे होने के बावजूद उसे कोई घमंड नहीं था। इत्यादि। सबसे अच्छी बात यह थी कि वह गार्गी को बहुत चाहता था और पहली बार देखते ही लट्टू हो गया था। बहुत देर तक गार्गी रोहित की गाथा सुनाती रही। उसकी खुशी देख कर मैं कुछ कह नहीं सकी। दोनों को आशीर्वाद देकर आगे बढ़ गई।
उसके बाद बहुत दिनों तक गार्गी से मिलना नहीं हो पाया। कई वर्षों बाद उसकी दोस्त रंजना ने बताया कि दोनों का ब्रेकअप हो गया। गार्गी के पिता को भी इन बातों का पता चल चुका था। इसलिए आगे की पढ़ाई के लिए उन्होने उसे दिल्ली भेज दिया। कहीं कहीं से सुनने मिला कि रोहित ही नहीं, उसपर जान छिड़कने वाले और भी बहुत लड़के थे।
वह थी भी तो बहुत अच्छी। इसके एक साल बाद उससे मेरी मुलाक़ात पटना एयरपोर्ट पर हुई। मैं अपने एक रिश्तेदार की शादी में भाग लेने पटना गई थी। लेकिन मुझे देख कर वह पहले की तरह खुश नहीं हुई बल्कि थोड़ी झेंप गई, जैसे कुछ छुपा रही हो। मुझे इस प्रतिक्रिया का कारण समझ नहीं आया। रांची पहुँच कर जब एक बार बातों बातों में मैंने गार्गी से मिलने का जिक्र रंजना से किया तब उसने मेरा विश्वास नहीं किया। वह यह मानने के लिए तैयार नहीं थी कि गार्गी पटना आए और रांची आ कर अपने घर वालों से नहीं मिले या फिर रंजना को नहीं बताए। मैंने जानबूझ कर बात आगे नहीं बढ़ाया।
सच्चाई गार्गी ने स्वयं बताया जब दो साल बाद वह रांची आई और मुझ से मिली। “मैं माध्यम वर्गीय परिवार में पैदा हुई हूँ, लेकिन वैसे मरना नहीं चाहती। रोज लाखों लोग कीड़ों मकोड़ों की तरह मरते हैं लेकिन मैं वैसे नहीं मरना चाहती।…….. डैडी मेरी शादी करवाना चाहते हैं लेकिन मैं किसी 10 से 5 नौकरी वाले से शादी नहीं करना चाहती……….. डैडी कहते हैं कि लोग क्या कहेंगे, समाज क्या कहेंगे, उन्हें मेरी नहीं, लोगों की चिंता है।…..”
“तो तुम शादी नहीं करोगी?” मैंने सहमते से पूछा।
“हाँ, करूंगी क्यों नहीं लेकिन अपनी मर्जी से….”
“अगर कोई ऐसा लड़का है तो घर वालों को कहो, शायद मान जाएँ।”
“घर वाले तो मान जाएंगे लेकिन ऐसा लड़का मिले तब तो।”
“कैसा लड़का चाहती हो तुम?”
“जिसकी समाज में रुतबा हो, पावर हो, जो मुझे समझ सके, जिसके साथ मेरा भविष्य सुरक्षित हो।”
“तो तुम भी तो समाज की ही बात कर रही हो।”
“कम-से-कम आप तो मुझे समझिए मैम ….. मै डैडी की तरह जाति, बिरादरी, धर्म की बात नहीं कर रही… मै अपने भविष्य को सुरक्षित देखना चाहती हूँ, बच्चों को अच्छी परवरिश देना चाहती हूँ……. मैं भी शादी करना चाहती हूँ, बच्चे चाहती हूँ लेकिन उनमें कैद नहीं होना चाहती, मैं स्वतंत्र रहना चाहती हूँ।” गार्गी ने खीझे हुए स्वर में कहा।
“तो तुम स्वतंत्र नहीं हो अभी!” मेरे स्वर में आश्चर्य था।
“हमारा समाज आज भी पेट्रियार्कल है मैम। डैडी से जब भी दिल्ली में घर खरीद देने के लिए कहती हूँ तो कहते हैं पहले शादी कर लो, फिर पति जहाँ चाहे वहाँ सेटल हो जाना, वहीं घर खरीद दूँगा। अब क्या मेरा पति इतना भी कैपेबल नहीं होगा कि घर खरीद लेगा, मुझे अभी पापा के सपोर्ट की जरूरत है लेकिन उनको मुझ पर भरोसा ही नहीं है। सबकुछ मेरे पति को ही देंगे।”
“तुम खुद भी तो पढ़ी-लिखी हो, तुम भी तो कमा सकती हो।”
“हाँ कर सकती थी लेकिन मैंने बहुत समय प्यार मुहब्बत में बिता दिया, लगता था कोई अच्छा लड़का मिल जाएगा तो डैडी भी खुश हो जाएंगे और मुझे भी अधिक सपोर्ट मिल सकेगा।”
“तो?”
“तो……. साले सारे….. ” कुछ गालियाँ निकालने लगी लेकिन मेरा संकोच कर चुप हो गई, “मिले तो कई लेकिन किसी न किसी कारण से बात शादी तक नहीं पहुँच पाई।”
“तो अब क्या सोच रही हो?” मैंने यूँ ही पूछ लिया।
“अब फिर से पढ़ाई पर ध्यान लगा रही हूं, शायद कोई अच्छी नौकरी मिल जाए।”
“और शादी?”
“वह भी हो ही जाएगी….. लड़कों की कोई कमी थोड़े ही है, मिल ही जाएंगे……. लेकिन जैसा डैडी ढूंढते हैं वैसा तो नहीं करूंगी। ब्योरोक्रेट्स, मिनिस्टर, बिजीनेस टाइकुन, कोई सेलेब्रिटी जैसे सफल लोग हों तभी तो वह मुझे भी सपोर्ट दे पाएगा।”
कुछ देर ऐसे ही बाते होती रही। इन बातों के बाद मेरा फिर उससे बात करने का मन नहीं किया। कई सालों तक उसके विषय में कोई खबर नहीं थी। वह फेसबुक फ्रेंड लिस्ट में थी लेकिन कभी न तो मैंने उसे मैसेज किया न ही उसने ही किया। वह पोस्ट कम ही किया करती थी बस कभी कभी कहीं घूमने या इवेंट में जाती या फिर किसी बड़े सफल लोगों से मिलती तब उसका फोटो डालती थी। रचना ने बताया कि अब वह शादी करना चाहती है लेकिन लड़का नहीं मिल रहा है।
अलार्म बजने से मेरी नींद खुली। पता नहीं रात गार्गी के विषय में सोचते सोचते कब सो गई। बच्चों को तैयार करना, सबके लिए ब्रेकफ़ास्ट और लंच बनाना, फिर खुद तैयार होकर स्कूल जाना। कितना काम था। पर स्कूल पहुँच कर भी मैं गार्गी को दिमाग से नहीं निकाल पायी। क्लास से फुर्सत मिलते ही फेसबुक प्रोफ़ाइल पर जाकर उसका फोटो देखने लगी। एक खूबसूरत किशोरी या युवती की छवि ढूँढे से नहीं दिखी कहीं उसकी फोटो में।
शायद किसी कंपनी में कोई काम करती है। माँ पिता तो अब इस दुनिया में रहे नहीं उसके। भाई भी अपने परिवार और बिजनेस में लग गया था। पर पिता ने मरने से पहले कुछ संपत्ति गार्गी के नाम भी कर दिया था। कभी-कभी भाई भी कुछ मदद कर देता था।
अंतिम बार मैं उसे ऋषिकेश के एक होटल में देखी थी। अपने पति और बच्चों के साथ गर्मी की छुट्टियाँ मनाने ऋषिकेश गई थी। गंगा के पवित्र जल में स्नान और साथ ही वाटर स्पोर्ट का एडवेंचर भी। दो दिन हरिद्वार में रुकने के बाद हमलोग ऋषिकेश पहुंचे थे। गंगा किनारे सूर्योदय का दृश्य देखना था। इसलिए सुबह ही हमलोग होटल के कमरे से निकलने वाले थे। अचानक गार्गी मुझे काउंटर के पास से निकलती हुई दिखाई दी। मैं उसे पहचानने में निश्चित नहीं हो पा रही थी।
हाँ हाँ वही तो है। वजन थोड़ा बढ़ गया था। लग रहा था वन पीस ड्रेस में मोटापे को छुपाने का प्रयास किया जा रहा था। भूरे और हरे रंग से हाइ लाइट कर बालों की सफेदी को छुपाया गया था। जरूरत से अधिक ब्लीच से चेहरा असामान्य रूप से सफ़ेद लग रहा था। भौहों की सफेदी को छुपाने के लिए आइब्रो पेंसिल का प्रयोग किया गया था। उम्र अगर स्वाभाविक रूप से आती है तो शालीनता लाती है लेकिन अगर उसे जबर्दस्ती रोका जाय तो कभी कभी भद्दापन भी ले लाती है।
मैं काउंटर पर जाकर पूछी कि क्या इस गेस्ट का नाम गार्गी था। होटल वाले ने बताया कि वह उनकी गेस्ट नहीं थी। यहाँ इटली से आया हुआ एक पर्यटक रुका हुआ है। यह उसके साथ ही कल शाम को यहाँ आई थी। मैं जानबूझ कर गार्गी के सामने नहीं आई।
स्पोर्ट साइट पर कैंटीन में मुझे वह फिर दिखी। दो लड़कियों के साथ हंसी-मज़ाक कर रही थी। वे लोग कुछ देर बाद ही वहाँ से अपनी कार से दिल्ली के लिए निकल गए।
स्कूल से आ कर मैंने बच्चों को नाश्ता दिया और खुद भी खाने लगी। पति देर से आते थे इसलिए थोड़ा आराम करने के बाद ही मैं खाना बनाने जाती थी।
अचानक स्नेहा ने कहा “मम्मी, मैंने गूगल में सर्च किया था आज।”
“क्या?”
“मेडुसा के बारे में।” उसने उत्साहित होते हुए कहा।
“तो बताओ न दीदी क्या हुआ उसके साथ? वह हमेशा ऐसे ही रही?” श्रेय उससे भी उत्साहित होते हुए झट से पूछ बैठा।
“अरे नहीं, पर्सियस ने उसे मार डाला। पर्सियस ने उसे मारने के लिए बड़ा स्मार्ट ट्रिक अपनाया था। चूँकि जो कोई मेडुसा को देखता था वह पत्थर में बदल जाता था इसलिए उसे मारना बहुत कठिन था। अंत में पर्सियस को उसे मारने के लिए भेजा गया। उसने अपनी ढ़ाल पर इतना अधिक पॉलिश कर लिया था कि उसमें मेडुसा का प्रतिबिंब साफ दिखता था। पर्सियस ने बिना उसकी ओर देखे, ढ़ाल में उसका प्रतिबिंब देख कर तलवार से उसका सिर काट डाला। कहते हैं कि पर्सियस ने उसके कटे सिर को आगे की लड़ाई में अपने ढाल पर इस्तेमाल किया ताकि उससे लड़ने वाले शत्रु पत्थर में बदल जाए।” स्नेहा ने एक साँस में ही सारी कहानी सुना दिया।
“सो सैड! बेचारी मेडुसा! लेकिन दीदी उसे यह शाप मिला क्यों था?” श्रेय की जिज्ञासा बढ़ती जा रही थी।
स्नेहा ने तपाक से कहा “मेडुसा ने पुजारिन के रूप में ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा की हुई थी। लेकिन उसे समुद्र के देवता पोसिडॉन से प्रेम हो गया। इस कारण एथेना ने उसे शाप दिया।”
स्नेहा जैसे खुद के उत्तर से संतुष्ट नहीं हो, मेरी तरफ देख कर बोली “प्रेम के लिए ऐसी सजा! ये गलत नहीं है मम्मी?”
श्रेय का प्रश्न भी ऐसा ही था “क्या प्रेम करना इतना बुरा है?”
“नहीं बेटे। प्रेम करना गलत नहीं है। सपने देखना भी गलत नहीं है। गलत है अपनी सीमा से आगे निकल जाना। अपनी मर्यादा तोड़ देना।” मैं धीरे से बोली।
स्नेहा ने हल्का सा तर्क किया, “लेकिन जिस अपराध के लिए मेडुसा को शाप मिला उसी अपराध के लिए पोसिडॉन को कुछ नहीं कहा गया, क्या यह पक्षपात नहीं है?”
“अपनी मर्यादा मेडुसा ने छोड़ा था, पोसिडॉन ने नहीं। अगर वह छोड़ता तो शायद इसका परिणाम भी उतना ही घातक होता। पोसिडॉन समुद्र का देवता था। समुद्र अगर अपनी सीमा लांघने लगे तब इस सृष्टि का तो विनाश हो ही जाएगा साथ ही खुद समुद्र का अस्तित्व भी नहीं बचेगा। वह अस्तित्व में है क्योंकि वह अपनी सीमा में है।”
दोनों बच्चे मुझे देख रहे थे जैसे कुछ समझने का प्रयास कर रहे हों।

Nice story