दुनिया के सबसे ऊंचे पर्वत माउंट एवरेस्ट पर तो अभी तक लगभग 7000 लोग चढ़ गए हैं। स्थानीय शेरपा लोग भी इस पर चढ़ते रहे हैं। लेकिन उससे 2200 मीटर कम ऊंचे कैलाश पर्वत पर अभी तक क्यों नहीं चढ़ा जा सका है? क्या हुआ जब हेलीकाप्टर से कैलाश पर जाने का प्रयास किया गया? सेटेलाइट ने क्या देखा?
इतने आश्चर्यजनक दावे वाले स्थान के लिए खोज के क्या क्या कोशिशें हुईं हैं? इस पर वैज्ञानिकों के मत क्या हैं? कैलाश पर्वत को जानने के इन सब प्रयासों पर हम आज बात करते हैं।
शिखर पर चढ़ाई के लिए कानूनी प्रतिबंध
कैलाश पर चढ़ाई के प्रयास के दौरान होने वाली दुर्घटनाओं, मौतों और लोगों में इस पर्वत के प्रति पवित्रता की धारणाओं के कारण चीन सरकार ने 2001 से इस पर किसी भी तरह की चढ़ाई को प्रतिबंधित कर दिया। साथ ही इससे संबन्धित सभी खोजी प्रयास रोक दिए गए हैं।
कैलाश शिखर पर चढ़ने वाला इकलौता व्यक्ति
अभी तक इस पर चढ़ने के अनेक प्रयास हो चुके हैं लेकिन लेकिन ऐतिहासिक काल से आज तक कैलाश पर एक को छोड़ कर किसी का चढ़ना ज्ञात नहीं है।
इतिहास में केवल एक तिब्बती योगी मिलारेपा द्वारा 12वीं शताब्दी में इस पर चढ़ने का विवरण है। लेकिन वह वहाँ बहुत कम देर रहे। उन्होने कभी इसके विषय में न तो अधिक कुछ कहा और न ही वह चाहते थे कि कोई और भविष्य में उस पर चढ़े। उनके साथ प्रतिस्पर्था कर चढ़ने वाला व्यक्ति नारो बॉन चुंग शिखर के पास जाकर कुछ अलौकिक कारणों से ऊपर नहीं जा सका।
कैलाश संबंधी अन्वेषण
ब्रिटिश भारत सरकार द्वारा
भारत, नेपाल और तिब्बत के लोग प्राचीन काल से मानसरोवर की यात्रा करते थे। लेकिन 20वीं शताब्दी में इस पर अधिकार का दावा चीन और ब्रिटिश भारत की सरकार करने लगी। 1926 में अल्मोड़ा के उपायुक्त (डेप्युटी कमिश्नर) ह्यू रटलेज (Hugh Ruttledge) ने तिब्बत की यात्रा की। वह नगरी नामक स्थान के एक स्थानीय नेता, जिन्हें तिब्बती लोग गार्पोन (Garpon) कहते हैं, से मिलने गए थे। लेकिन उस समय गार्पोन कहीं बाहर गए थे। ह्यू ने कैलाश पर्वत की परिक्रमा करते हुए उसका अध्ययन किया। उनके अनुसार यह पर्वत लगभग 6,000 मीटर अथवा 20,000 फिट ऊंचा है लेकिन इस पर चढ़ना लगभग असंभव है। इसके उत्तरपूर्व दिशा से चढ़ने की संभावना का पता लगाने के लिए कर्नल आर॰ सी॰ विल्सन एक शेरपा के साथ थे। पहले तो उन्होने दावा किया कि उन्होने चोटी पर चढ़ने का रास्ता खोज लिया है। पर भारी हिमपात के कारण उनके लिए भी चढ़ाई असंभव हो गया।

1936 में हर्बर्ट टिची (Herbert Tichy) ने फिर कैलाश पर चढ़ने का प्रयास किया। स्थानीय गार्पोन ने उसे बताया कि “यह केवल बर्फ की दीवार पर चढ़ना नहीं है बल्कि जो सभी तरह के पापों से मुक्त होगा वही इस पर पक्षी की तरह उड़ कर इसकी चोटी पर चढ़ सकेगा।”
चीन सरकार द्वारा
1950-51 में चीन ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया। कैलाश पर्वत तिब्बत का ही भाग है। इसके बाद चीन सरकार की अनुमति आवश्यक हो गई इस पर शोध करने के लिए।
1980 के दशक के मध्य में चीन सरकार ने इटली के एक बहुत ही प्रसिद्ध पर्वतारोही रेनहोल्ड मेसनर जो कि माउंट एवरेस्ट पर अकेले और बिना मास्क के चढ़ने वाले पहले पर्वतारोही थे, को इस पर चढ़ने का अवसर दिया लेकिन नजदीक पहुँच कर उन्होने यह कह कर मना कर दिया कि “अगर हम इस पर्वत पर विजय प्राप्त करते हैं तो हम लोगों की आत्माओं में कुछ जीत लेंगे।”
2001 में स्पेनिश पर्वतारोहियों के एक दल ने इस पर चढ़ने का प्रयास किया। लेकिन वह सफल नहीं हो सकी।
आज तक कोई मनुष्य इस पवित्र पर्वत पर नहीं चढ़ पाया। जिसने भी चढ़ने की कोशिश की, उसकी मृत्यु हो गई। कहा जाता है कि 19 वीं और 20 वीं सदी के शुरू में कुछ पर्वतारोहियों ने इस पर चढ़ने की कोशिश की थी और गायब हो गए थे।
चीन द्वारा कैलाश पर हेलिकॉप्टर भेजना
कैलाश पर्वत के ऊपर प्लेन या हेलिकॉप्टर उड़ाना मना है क्योंकि इस क्षेत्र में अचानक मौसम बदलता है जो खतरनाक हो सकता है। लेकिन जब चीन ने देखा कि कोई मानव अभियान दल इस पर चढ़ नहीं पा रहा है तो उसने इस पर एक खोजी दल के साथ हेलिकॉप्टर भेजने का निश्चय किया। कई महीने तक रिसर्च के बाद साफ मौसम के पूर्वानुमान के बाद जब हेलिकॉप्टर उड़ा तब पहले तो मौसम अच्छा था, लगा यह दल शिखर को नजदीक से देख पाएगा। लेकिन अचानक मौसम बहुत खराब हो गया, बादल घिरने लगे और पर्वत पर हिमस्वखलन के दृश्य दिखने लगे। हेलिकॉप्टर हिम्मत कर आगे बढ़ता गया। पर हिमपात और काले काले बादलों से यह घिर गया। कुछ भी देख सकना असंभव हो गया। ऊंचाई पर हवा का दबाव इतना बढ़ गया कि हेलिकॉप्टर नियंत्रित करना कठिन हो गया। चीन के वैज्ञानिकों ने बताया कि इसकी भौगोलिक स्थिति ऐसे है कि ऊंचाई पर जाकर सभी दिशाएँ एक सी हो जाती है। कम्पास काम करना बंद कर देता है। उन्हें दिशाभ्रम हो गया। अंततः उन्होने वापस आने का निर्णय लिया। इसके बाद फिर कोई ऐसा अभियान नहीं भेजा गया।
1999 का रूसी अभियन दल
कैलाश संबंधी रहस्यों को रूसी शोधकर्ताओं के विचारों से सबसे अधिक समर्थन मिला। 1999 में रूस के एक नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ एनर्स्ट मुल्दाशिफ ने यह तय किया कि वे कैलाश पर्वत के रहस्यों को खोलने के लिए उस इलाके में जाएंगे। उनकी पर्वतारोहण टीम में भूविज्ञान व भौतिकी के विशेषज्ञ और इतिहासकार शामिल थे। इस दल के सदस्यों ने कई तिब्बती लामाओं से मुलाकात की। पवित्र कैलाश पर्वत के आसपास कई महीने बिताए।
वापस आने पर मुल्दाशिफ ने एक किताब लिखी, व्हेयर डू वी कम फ्राम। इसमें उन्होंने कैलाश यात्रा की काफी चर्चा की है। उन्होने दावा किया कि कैलाश पर्वत वास्तव में एक प्राचीन मानव निर्मित पिरामिड है, जो अनेक छोटे-छोटे पिरामिडों से घिरा हुआ है। इसके तार गीज़ा व मैक्सिको के टिओथ्युआकान के पिरामिडों से जुड़े हैं।
एर्नस्ट मुल्दाशिफ ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि उन्हें एक बार साइबेरियाई पर्वतारोही ने बताया था कि कुछ पर्वतारोही कैसे कैलाश पर्वत पर एक निश्चित बिन्दु तक पहुँचे। उसके बाद वे अचानक बूढ़े दिखाई देने लगे। इसके एक साल बाद ही बुढ़ापे की वजह से उनकी मृत्यु हो गई।
उनकी टीम इस निष्कर्ष पर पहुँची कि वास्तव में कैलाश पर्वत पारलौकिक गतिविधियों का केन्द्र है। उन्होने लिखा “रात की ख़ामोशी में पहाड़ के भीतर से एक अजीब तरह की फुसफुसाहटों की आवाज़ सुनाई देती है। एक रात अपने दोनों सहयोगियों के साथ मैंने साफ़-साफ़ पत्थरों के गिरने की आवाज़ सुनी थी। यह आवाज़ कैलाश पर्वत के पेट के भीतर से सुनाई दे रही थी। हमें ऐसा लगा कि जैसे इस पिरामिड के अन्दर कुछ लोग रहते हैं।
इसी लेख में उन्होने आगे लिख, “तिब्बती ग्रन्थों में लिखा हुआ है कि शम्बाला एक आध्यात्मिक देश है, जो कैलाश पर्वत के उत्तर-पश्चिम में स्थित है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इस विषय पर चर्चा करना मेरे लिए मुश्किल है। मैं पूरी सकारात्मकता से यह कह सकता हूँ कि कैलाश पर्वत का इलाका सीधे-सीधे पृथ्वी के जीवन से जुड़ा हुआ है।
जब हमने सिद्धों और तपस्वियों के राज्य’ तथा ‘पिरामिडों और पत्थरों के दर्पण’ को साथ मिलाकर देखा तो हम हैरान रह गए क्योंकि यह योजनाबद्ध नक्शा डीएनए के अणुओं की संरचना का नक्शा था।”
कैलाश पर्वत और उसके आस पास के वातावरण पर अध्ययन कर रहे वैज्ञानिक ज़ार निकोलाइ रोमनोव और उनकी टीम ने तिब्बत के मंदिरों में धर्मं गुरुओं से मुलाकात की। उन्होंने बताया कैलाश पर्वत के चारों ओर एक अलौकिक शक्ति का प्रवाह होता है जिसमें तपस्वी आज भी आध्यात्मिक गुरुओं के साथ टेलीपैथी से संपर्क करते हैं।

प्रसिद्ध रूसी चित्रकार निकोलाय रेरिख़ को यह विश्वास था कि कैलास के आसपास के इलाके में शम्बाला नाम का एक रहस्यमयी राज्य है। हिंदुओं के कुछ संप्रदाय इस शम्बाला राज्य को कपापा के नाम से पुकारते हैं, जहाँ सिर्फ़ सिद्ध और तपस्वी ही रहते हैं।
रूसी पर्वतारोही सर्गेई सिस्टियाकोव की तबीयत चोटी के करीब पहुँच अचानक खराब होने लगी। उन्हें कमजोरी और बेचैनी महसूस होने लगी एवं दिल की धड़कन बढ़ने लगी। जैसे-जैसे नीचे आते गए उनकी तबीयत ठीक होती गई।
रूसी शोधकर्ताओं के इन दावों से कैलाश के रहस्यों पर दुनिया भर के लोगों की रुचि बढ़ने लगी। साथ ही इस पर और भी बहुत से दावे किए जाने लगे।
नासा की खोज
2015 में अमेरिकी अन्तरिक्ष एजेंसी नासा में अपने सेटेलाइट को कैलाश पर्वत पर फोकस कर दिया। लेकिन उसे कोई विशेष या असामान्य गतिविधि नहीं दिखा। पर सूर्यास्त के समय जो शिखर की जो प्रतिछाया पड़ती है उसे वैज्ञानिक केवल छाया मानते हैं लेकिन कुछ अस्थावान हिन्दू इसकी तुलना भगवान शिव के ध्यानमय अवस्था से करने लगे। पर इंटरनेट पर नासा के नाम से जो अधिकांश फोटो और वीडियो वायरल हो रहा है जिस पर शिव विभिन्न रूपों में कैलाश पर दिखाई दे रहे हैं, उनमें से अधिकांश फेक हैं और कंप्यूटर द्वारा बनाए गए हैं।
क्यों नहीं चढ़ा जा सका है कैलाश शिखर पर
वैज्ञानिकों के अनुसार यहाँ तेजी से बदलने वाले मौसम और सभी तरफ से खड़ी ढाल के कारण इस पर पहुँचना कठिन है। चट्टानों के किनारे बर्फ से ढंके होते हैं। यहाँ मैगनेटिक फील्ड ज्यादा सक्रिय हैं जिस कारण चढ़ाई और कठिन हो जाती है। तेजी से बदलते मौसम के कारण यहाँ कम्पास जैसे यंत्र काम नहीं करते।
जबकि आध्यात्मिक-धार्मिक मान्यता वाले लोगों के अनुसार कैलाश के आसपास अलौकिक ऊर्जा है जिस कारण यहाँ पहुँचना कठिन है। अनेक बौद्ध संत मानते हैं कि यहाँ केवल वही पहुँच सकता है जो पुण्यात्मा हो और जिसने उच्च आध्यात्मिक सिद्धि प्राप्त की हो। यह भी कहा जाता है कि यहाँ अमर या चिरंजीवी लोग ही जा सकते हैं साधारण मर्त्य मनुष्य नहीं। चूंकि यह देवताओं का निवास है इसलिए इस पर किसी साधारण व्यक्ति को जाना नहीं चाहिए। दैवी प्रकोप के कारण ही अभी तक कोई इस पर नहीं चढ़ पाया है और अगर कोई इसके नजदीक भी गया है तो किसी दुर्घटना या मृत्यु का शिकार हो गया।
कई पर्वतारोहियों ने दावा किया कि ऊपर चढ़ने का प्रयास करते समय उन्हें दिशा और समय का भ्रम होने लगा, लगने लगा जैसे शिखर अपना स्थान बदल रहा हो, रास्ते खो गए और ऊपर चढ़ नहीं सके। इसकी व्याख्या वैज्ञानिक और आस्था अपने अपने अनुसार करते हैं।
कैलाश के विषय में विभिन्न दावे और वैज्ञानिकों के इस पर विचार
सेटेलाइट या अन्य माध्यम द्वारा अभी तक यह केवल एक शांत पर्वत दिखता है। इस पर किसी प्राणी के होने या कोई असामान्य घटना होने के कोई प्रमाण नहीं मिला है। आधुनिक तकनीकों से अभी यह पता नहीं लगाया जा सका है कि कैलाश पर्वत अंदर से खोखला है या यह मानव निर्मित है। इसलिए अभी तक इन मान्यताओं का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं मिला है।

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