क्या पृथ्वी पर कोई ऐसा स्थान है जहां जाने से आपकी आयु एक दिन में एक महीने बढ़ जाए? जहां आपके नाखून और बाल चार गुना तेजी से बढ़ने लगे? क्या कोई पर्वत मानव निर्मित हो सकता है? क्या कोई पर्वत खोखला हो सकता है? कोई पर्वत ऐसा हो सकता है जिसके ऊपर पंछी तो उड़ सके लेकिन प्लेन नहीं उड़ सके?
ऐसी अनेक ही बातें जुड़ी हुई हैं कैलाश पर्वत के साथ। यह पर्वत चार धर्म के अनुयायियों द्वारा बहुत ही पवित्र माना जाता है। लेकिन अपनी पवित्रता के कारण जितना यह आकर्षण का केंद्र है उससे अधिक अपने रहस्यों के कारण दुनिया भर के वैज्ञानिकों, पर्वतारोहियों, पर पुरानी सभ्यताओं में रुचि रखने वालों के बीच लोकप्रिय है। इन रहस्यों को कुछ पर्वतारोहियों के किताबों में उनके दावों से बल मिला। लेकिन अभी तक इस दिशा में हुई खोजों ने रहस्यों को सुलझाने के बदले उलझा दिया है। वास्तव में हर अन्वेषण उत्तर देने के बजाय प्रश्न ही उत्पन्न कर रहा है। तो क्या हैं कैलाश पर्वत के रहस्य? इसके धार्मिक, आध्यात्मिक और वैज्ञानिक सभी पहलुओं पर आज बात करेंगे।
कैलाश का नाम और अर्थ
इस पर्वत का नाम संस्कृत में ‘कैलाश’ है जिसे बोलचाल में ‘कैलास’ कह देते हैं। ऐसा माना जाता है यह ‘केलास’ शब्द से निकला है जिसका अर्थ होता है क्रिस्टल। इसका एक अर्थ ‘शांत स्थान’ से भी लगाया जाता है। तिब्बती बुद्ध इसे कांगरी रिनपोचे कहते हैं जिसका अर्थ होता है ‘मूल्यवान हिम पर्वत (presious snow mountain’। इसके लिए विभिन्न भाषाओं में अनेक शब्द आए हैं जिनके अर्थ होते हैं ‘पानी के फूल (water’s flower) समुद्री जल का पहाड़ (mountain of sea water), नौ स्वस्तिक का पहाड़ आदि। इन नामों से इस पर्वत की विशेषताओं का पता चलता है। लेकिन हम इसे कैलाश ही कहेंगे।
कैलाश के आसपास इसके बराबर या बड़ा कोई अन्य शिखर नहीं है। इससे यह एकांत में बसा हुआ शांत शिखर लगता है। आसपास के छोटे शिखरों की तुलना इसके कमल आसन से की गई है।
ब्रह्मपुत्र, सतलज जैसी बड़ी नदियों का उद्गम कैलाश पर्वत से ही हुआ है। इस शिखर की ऊंचाई 6,638 मीटर यानि 21,778 फुट है।
यह कहाँ है?
कैलाश पर्वत चीन के राजनीतिक नियंत्रण में आने वाले स्वायत्त प्रदेश तिब्बत में स्थित है। यह समस्त क्षेत्र हिमालय पर्वत श्रेणी का ही भाग है जो की तिब्बत के दक्षिण-पश्चिम कोने पर स्थित है। यह ल्हा चू और झोंग जू पर्वत के बीच फैला है। कैलाश पर्वत के उत्तरी शिखर का नाम कैलाश शिखर है। यह शिखर विशाल शिव लिंग या पिरामिड की तरह दिखता है। इस शिखर के चारों ओर 16 इससे छोटे-छोटे शिखर हैं। इस कारण ग्रन्थों में इसे 16 कमल दलों के बीच स्थित बताया गया है। शिखर का अधिकांश भाग हमेशा बर्फ से ढंका रहता है। हाँ गर्मी के बर्फ की मात्रा कुछ भागों में कम जरूर हो जाती है।
शिखर के नीचे दो सरोवर हैं- मानसरोवर और राक्षस ताल। सरोवर और शिखर सहित इस क्षेत्र को मानस खंड कहते हैं। विभिन्न ग्रन्थों में इसके लिए अष्टापद, गण पर्वत और रजतगिरि शब्द भी आया है। ऐसा माना जाता है की पुराणों में वर्णित मेरु पर्वत कैलाश पर्वत ही
तीर्थयात्री मानसरोवर तक ही जाते हैं। इससे आगे कैलाश शिखर पर चढ़ने की अनुमति किसी को नहीं है। अनुमति क्यों नहीं है, इस पर हम आगे बात करेंगे।
धार्मिक आध्यात्मिक महत्व
कैलाश पर्वत के रहस्यों की बात करने से पहले इसके धार्मिक आध्यात्मिक महत्व की बात कर लेते हैं। हिन्दू, बौद्ध, जैन और बॉन- इन चारों धर्मों में इसे अत्यंत पवित्र क्षेत्र माना गया है।
हिन्दू धर्म के अनुसार यह भगवान शिव का निवास स्थान होने के कारण अत्यंत पवित्र है। माना जाता है कि भगवान शिव यहाँ देवी पार्वती के साथ ध्यान करते हैं। महाभारत में अनेक ऋषि मुनियों के यहाँ रहने और अर्जुन के यहाँ आने का वृतांत मिलता है। पांडव अपनी पत्नी द्रौपदी के साथ हिमालय के मानसखंड क्षेत्र में ही शरीर का अंत करने गए थे।
पहले जैन तीर्थंकर ऋषभदेव ने यहाँ निर्वाण प्राप्त किया था। उनके पुत्र भरत स्वामी ने दिग्विजय के समय इस पर भी विजय प्राप्त किया और रत्नों के 72 जिनालय बनवाया था। 24वें एवं अंतिम जैन तीर्थंकर महावीर को इन्द्र उनके जन्म के बाद यहाँ लाए थे। इसलिए जैन धर्म में इसे पवित्र माना जाता है। जैन धर्म के अनुयायी कैलाश को अष्टापद कहते हैं।
बौद्ध और तिब्बत के स्थानीय बॉन धर्म में भी मेरु यानि कि कैलाश पर्वत का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। बौद्ध ग्रन्थों के अनुसार कैलाश और मानसरोवर विश्व के पिता और माता हैं। बौद्ध धर्म के तांत्रिक मत के संस्थापक पद्मसंभव से संबन्धित अनेक स्थान इस क्षेत्र में हैं। वज्रयान मत के महान तिब्बती संत मिलारेपा (1052-1135 ई) की साधना का स्थल यही क्षेत्र है।
तिब्बती बौद्धों का मानना है कि परम आनन्द के प्रतीक बुद्ध डेमचोक (धर्मपाल) कैलाश पर्वत के अधिष्ठाता देव हैं। वह कैलास पर निवास के करते हैं। बॉन मतावलंबी कैलाश को अपने आकाश देवी का रूप मानते हैं। वह भी मानते हैं कि यह संसार का केंद्र है।
धर्मग्रन्थों में कैलाश को मेरु पर्वत के रूप में उल्लेखित किया गया है। इसे पृथ्वी और स्वर्ग के बीच का मार्ग कहा गया है। विष्णु पुराण में इसे पृथ्वी का केंद्र कहा गया है जो कमल की तरह अन्य पर्वत शिखरों से घिरा हुआ है। कहते हैं कि रावण यहीं से सीढ़ी बनाना चाहता था स्वर्ग जाने के लिए।
मिलरेपा अभी तक के एकमात्र व्यक्ति माने जाते हैं जो कैलाश शिखर पर चढ़ सके हैं।
कैलाश की परिक्रमा
सभी धर्मों में कैलाश की परिक्रमा का विशेष महत्व है। यह परिक्रमा तारचेन से आरंभ होकर वहीं समाप्त होती है। परिक्रमा पथ में मंधाता पर्वत स्थित गुर्लला पास, मानसरोवर, राक्षसताल, तीर्थपुरी, डोलमाला इत्यादि आते हैं। तीर्थपुरी में गर्म पानी के झरने हैं जिसके आसपास चूनखड़ी के टीले हैं। माना जाता है भस्मासुर ने यहीं तप किया था और यहीं वह भस्म हुआ था। इसी रास्ते में मणि पत्थर मिलते हैं। यह समस्त मार्ग अत्यंत सुंदर प्रकृतिक दृश्यों से भरपूर है। मार्ग में अनेक और बौद्ध स्तूप एवं मठ भी मिलते हैं हालांकि इनमें से अनेक 1966 से 1976 तक चलने वाले चीन के ‘सांस्कृतिक क्रांति’ के दौरान नष्ट कर दिए गए हैं। इसी प्रदेश में एक सुगंधित पौधा मिलता है जिसे कैलाश धूप कहते हैं। यहाँ से प्रसाद के रूप में लोग उसे ही लाते हैं। परिक्रमा मार्ग में कहीं भी कैलाश शिखर पर पैर रखना या चढ़ने की कोशिश करना धर्म विररुद्ध माना जाता है और चीन के कानून के अनुसार मना है।
मानसरोवर तीर्थयात्रा और परिक्रमा बहुत पुराने समय से चला आ रहा था। लेकिन 1930 के आसपास इसे रोक दिया गया जबकि ब्रिटिश सरकार और चीन सरकार दोनों ही तिब्बत पर अपना अपना दावा करने लगे। 1950-51 में चीन ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया। इसके बाद तीर्थयात्रा की अनुमति दे दी गई। लेकिन भारतीयों को यह अनुमति 1954 के भारत-चीन समझौते से मिला। पर यह बहुत दिनों तक नहीं रह सका। 1959 में तिब्बत विद्रोह और 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद सीमा बंद कर दिया गया। 1981 के समझौते के बाद यात्रा फिर से शुरू हुई जो कि कोविड के समय को छोड़ कर अभी तक लगातार चल रही है। यात्रा अभी दो रस्तों से होता है उत्तराखंड के लीपु लेख दर्रे से और सिक्किम के नाथु ला दर्रे से। नाथु ला मार्ग 2015 से खुला है।
इसके आठ रहस्य कौन से हैं?
अब बात करते हैं इससे जुड़े रहस्यों की। इसके विषय में ये सात मान्यताएँ इसके विषय में उत्सुकता और बढ़ा देती है:
1. पिरामिड या शिवलिंग जैसी आकृति
कैलाश पर्वत की आकृति पिरामिड से मिलती जुलती है। इस क्षेत्र के पर्वत शिखर नुकीले (pointed) हैं लेकिन कैलाश शिखर के पास से कुछ इस तरह मुड़ा है जिससे लगभग (पूरी तरह से नहीं) शिवलिंग की आकृति लगता है। गर्मियों में जब आसपास के पहाड़ों पर बर्फ पिघल जाती है तब भी कैलाश शिखर पर बर्फ होता है।
पुराणों और विशेष कर बौद्ध मत की ब्रजयान शाखा के अनेक ग्रन्थों और यंत्रों के विवरण से कुछ लोग अनुमान लगाते हैं कि यह प्रकृतिक पर्वत नहीं बल्कि मानव निर्मित हो सकता है। कुछ लोग मानते हैं कि पूरा का पूरा पहाड़ खोखला है। इसके अंदर एक बहुत ही उन्नत सभ्यता निवास करती है। यही वह नगर है जिसकी चर्चा विभिन्न ग्रन्थों में शंभाला आदि नामों से की गई है। अनेक लोग पुराणों में उल्लेखित इस रहस्यमयी शहर या सभ्यता को वास्तविक मान कर इसके खोज का प्रयास भी कर चुके हैं। इन लोगों में जर्मनी का हिटलर भी शामिल है। मान्यताओं के अनुसार चिंतामणि नामक विशेष रत्न, हनुमान और अश्वस्थामा जैसे चिरंजीवी भी इसी शहर में रहते हैं और यहीं कल्कि अवतार होगा। इन लोगों की तकनीक हमसे बहुत उन्नत है, वे अन्य ब्रह्मांडीय पिंडों से संपर्क कर सकते हैं, टेलीपैथी और टाइम ट्रैवल जैसा तकनीक जानते हैं और बहुत दिनों तक जी सकते हैं। उन्होने अपने इस क्षेत्र को एकांत रखना चाहा है।
डॉ एनर्स्ट मुल्दाशिफ की अगुवाई वाले रूस के वैज्ञानिक दल ने एक शोध पत्र प्रकाशित किया था। उसके अनुसार कैलाश पर्वत के चारों तरफ की ढाल या दीवार एक निश्चित माप में बनी हुए है। यह रचना पिरामिड से मिलती जुलती लगती है। ऐसी सटीक रचना प्रकृतिक रूप से किसी पहाड़ की नहीं हो सकती। इसे इन्सानों ने ही बनाया है। लेकिन वे कौन इंसान थे और कब, क्यों, कैसे बनाया यह हम नहीं जानते। उनके अनुसार ये एक अकेला पिरामिड नहीं है बल्कि 100 पिरामिडों का एक तंत्र है जिसमें कैलाश सबसे ऊंचा पिरामिड है जो कि केंद्र में बना है। रूसी दल के इस शोध पर आगे विस्तार से बात करेंगे।
अन्य शोध के आधार पर इस पहाड़ का आधार ग्रेनाइट चट्टानों से बना है। यहाँ बर्फ की जो चट्टान है वह करीब 10,000 वर्ष पुरानी है।
2. डमरू और ॐ की आवाज
तीर्थयात्रियों को कैलाश पर्वत और मानसरोवर के आसपास निरंतर एक रहस्यमयी कंपन की तरह एक आवाज या गूंज सुनाई देती है। पहले ये आवाज दूर से आती हुई हवाई जहाज की आवाज सी लगती है। लेकिन ध्यान से सुनने पर ॐ की ध्वनि या डमरू की ध्वनि सी लगती है। कुछ वैज्ञानिक इसे बर्फ के पिघलने से आने वाली आवाज मानते हैं। लेकिन कुछ लोग इसे पर्वत के अंदर से आने वाली आवाज मानते हैं।
3. सात तरह की तीव्र रौशनी
कई लोगों ने बताया कि यहाँ रात के समय सात रंग की तेज रोशनी दिखाई देती है। यह संदेह व्यक्त किया गया है कि यह संभवतः चुम्बकीय बल के कारण हो।
4. हिम मानव
कई लोगों ने कैलाश के आसपास विशालकाय हिम मानव या यति को देखने का दावा किया है। लेकिन अभी तक इनका कोई ठोस प्रमाण नहीं मिल पाया है।
5. समय की तेज चाल
कई लोगों ने दावा किया है कि यहाँ आने पर समय की गति बढ़ जाती है। लोग बहुत जल्दी बूढ़े दिखने लगते हैं। उनके नाखून और बाल के बढ़ने की गति धरती के अन्य स्थानों की तुलना में चार गुनी तक हो जाती है। साइबेरियन पर्वतारोहियों के एक दल ने ….. में इस पर्वत चढ़ने का प्रयास किया। वे अपने प्रयास में शिखर के पास तक पहुँच गए। हालांकि वे ऊपर तक नहीं चढ़ पाएँ लेकिन सबसे आश्चर्यजनक बात यह हुई कि वहाँ से लौटने के एक साल के अंदर भी इस टीम के सभी सदस्यों की मृत्यु हो गई। डॉक्टर के अनुसार उनकी मृत्यु अधिक आयु होने के कारण हुई थी लेकिन वास्तव में उनकी इतनी आयु थी नहीं। तो क्या वहाँ लगभग एक महीने तक रहने के कारण उनका शरीर इतना बूढ़ा हो गया जितना कई वर्षों तक पृथ्वी पर रहने से होता? उनकी मृत्यु आज भी रहस्य बना हुआ है।
6. धरती का केंद्र
बौद्ध और हिन्दू ग्रन्थों में मेरु पर्वत को पृथ्वी का केंद्र कहा गया है। कहीं-कहीं यह भी संकेत मिलता है कि यह धरती के अन्य पर्वतों से और स्वर्ग से भी किसी तरह जुड़ा हुआ है। इस विषय पर रूस और अमेरिका के वैज्ञानिकों ने अध्ययन किया। यह पाया गया है कि ब्रिटेन स्थित स्टोन हेज, जो कि अपने आप में दुनिया का एक रहस्य है, की यहाँ से दूरी है 6,666 किमी। इतनी ही यानि कि 6,666 किमी की दूरी है उत्तरी ध्रुव की। 6,666 किमी का दुगुना यानि कि 13,332 किमी यहाँ से दक्षिणी ध्रुव दूर है। यह एक संयोग मात्र है या जैसा कि पवित्र ग्रन्थों में लिखा गया है यह पृथ्वी का मेरु है और यहाँ से ब्रह्मांडीय शक्तियों से संपर्क करना आसान है, यह अभी तक वैज्ञानिक रूप से साबित नहीं हो सका है।
7. ॐ और स्वस्तिक का बनना
कैलाश शिखर पर जब सूर्य अस्त होने लगता है और शिखर की छाया बनती है तो इसकी आकृति स्वस्तिक से मिलती जुलती लगती है। गर्मियों में जब बर्फ कुछ पिघल जाती है तब पहाड़ दक्षिण दिशा से देखने पर ॐ की आकृति दिखती है। धार्मिक दृष्टि से इसे देखने वाले इस क्षेत्र के पवित्र होने का यह प्रमाण मानते हैं। पर वैज्ञानिकों के अनुसार यह मात्र एक संयोग है।
8. मानसरोवर और राक्षस ताल के रहस्य
कैलाश के पास ही ये दोनों झील हैं। मानसरोवर और राक्षसताल के विषय में आश्चर्यजनक यह है दोनों आस पास हैं लेकिन दोनों के गुण एक दूसरे से विपरीत हैं।
मानसरोवर की आकृति लगभग गोल है जो सूर्य से मिलती जुलती है। इसका पानी बिलकुल ही शांत है, मीठा है। यह भीषण ठंढ में भी जमता नहीं है।
जबकि राक्षस ताल की आकृति अर्द्ध चंद्र की तरह है। इसका पानी समुद्र की तरह खारा है।
समान मौसम रहने पर भी मानसरोवर का जल शांत रहता है जबकि राक्षसताल के जल में लहरें उठती हैं। राक्षस ताल में कोई जीव जन्तु नहीं पाया जाता है।
ये दोनों मीठे और खारे पानी की दुनिया की क्रमशः सबसे ऊंची झील हैं।
इन दोनों को सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा से जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि राक्षस ताल का निर्माण स्वयं रावण ने करवाया था। उसने यहाँ स्नान कर ध्यान लगाया था। माना जाता है कि मानसरोवर में भगवान शिव और भगवान ब्रह्मा हंस का रूप धारण कर विचरण करते हैं। इसलिए इसे अत्यंत पवित्र माना जाता है।
दक्षिण दिशा से देखने पर इन दोनों झीलों के मिलने से स्वास्तिक की आकृति बनती हुई लगती है।
एक ही क्षेत्र के दो झीलों में इतना अंतर कैसे है, यह एक रहस्य बना हुआ है।
राक्षस ताल से लगभग 175 किमी दूर भारत के उत्तराखंड राज्य में रूपकुंड नामक एक झील है। इस झील में मनुष्यों के बहुत से कंकाल पाए जाते हैं। क्या कंकालों के इस झील का कैलाश और इसके इन दोनों झीलों से कोई संबंध है?
ऐसे रहस्यमय चीजों पर वैज्ञानिकों का ध्यान भी गया होगा और सच जानने के प्रयास भी हुए होंगे। ऐसे प्रयासों की बातें अगले भाग में।

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